अमेरिका के राष्ट्रपति पद के चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन और रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप के बीच कांटे की टक्कर है। सरकारी सर्वर से भेजे जाने वाले निजी ई-मेल प्रकरण के एक अन्य मामले में एफबीआई द्वारा दुबारा जांच शुरू करने के बाद चुनावी सर्वेक्षणों में ट्रंप अपनी प्रतिद्वंद्वी हिलेरी को झटका देते दिखाई दे रहे हैं तो इससे पहले तीसरी बहस तक हिलेरी उनसे आगे चल रही थीं। ऊंट की करवट चुनाव के बाद पता चलेगी, लेकिन इतना तय है कि भारत की बढ़ती हुई ताकत को कोई भी नया अमेरिकी राष्ट्रपति दरकिनार नहीं कर सकेगा। नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी व्हाइट हाउस में भारत अमेरिकी रिश्तों को जो मजबूती दी है उसकी उपेक्षा भविष्य में न तो ट्रंप कर सकते हैं और न ही हिलेरी।
अमेरिका में ट्रंप और हिलेरी दोनों ही प्रत्याशियों ने भारत को लेकर अपनी प्रतिबद्धता हर बार दोहराई है। यही नहीं बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति के फैसलों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली कांग्रेस (अमेरिकी संसद) ने भी अपनी एक रिपोर्ट में साफ कहा है कि आगामी दशकों में भारत-अमेरिकी संबंध दुनिया में सबसे बड़ी प्राथमिकता होना चाहिए। कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस (सीआरएस) की इस रिपोर्ट के अलावा सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (सीएसआईएस) ने भी अमेरिका के नए राष्ट्रपति को सौ दिन के भीतर भारत के पीएम मोदी से मुलाकात की सिफारिश की है।
अमेरिका द्वारा भारत के साथ की गई आधारभूत संधियों में रक्षा संबंध बेहद महत्वपूर्ण हैं। इनके बिना अमेरिका के लिए भारत को रक्षा, कंप्यूटिंग व संचार तकनीकी दे पाना असंभव हो जाएगा। ऐसे में भारत के साथ संबंध कमजोर रखकर न तो ट्रंप अमेरिका की आर्थिक स्तर पर कमर तोड़ना चाहंगे और न ही हिलेरी इतनी हिम्मत जुटा पाएंगी। इसके अलावा भारत, जापान व ऑस्ट्रेलिया के साथ रक्षा संबंधों के जरिये अमेरिका का मकसद प्रशांत व हिंद महासागर में साझा हित भी साधना चाहता है, ताकि चीन का प्रभाव रोका जा सके। अमेरिका में भारत के बढ़ते महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिकी थिंक टैंक किसी भी सूरत में अमेरिका के नए राष्ट्रपति से उम्मीद कर रहा है कि वह तालिबान से बातचीत के लिए चार पक्षीय समन्वय समूह में भारत को भी शामिल करें। अमेरिका का आगामी राष्ट्रपति चाहे रिपब्लिकन हो या डेमोक्रेटिक, उस पर थिंक टैंक का यह दबाव जारी रहेगा।
एनआरआई वोट बैंक पर मोदी का प्रभाव
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मैक्सिको और फेलिपिनो मूल के बाद भारतीय मूल के सबसे ज्यादा प्रवासी अमेरिका में रह रहे हैं। अमेरिका में भारतीय मूल के 16 लाख लोग हैं, जिनके वोट छह अमेरिकी प्रांतों में राष्ट्रपति पद के चुनावों के भीतर बड़ी भूमिका निभाते हैं। मोदी ने इन एनआरआई को भारत में कारोबार संबंधी नियमों में ढील देकर प्रभावित किया है। भारतीय मूल के अमेरिकी उद्योगपति और अमेरिकी हिंदू कोएलिशन के संस्थापक शलभ कुमान डोनाल्ड के मुताबिक नरेंद्र मोदी अपनी हर अमेरिकी यात्रा में एनआरआई पर खास प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहे हैं।
भारत के लिए फायदेमंद हिलेरी का अनुभव
बतौर सीनेटर अमेरिकी कांग्रेस में ‘इंडिया कॉकस’ प्रमुख रह चुकी हिलेरी क्लिंटन को न केवल दक्षिण एशिया मामलों की पूरी समझ है, बल्कि विदेश मंत्री रहते हुए उन्होंने आतंकवाद पर ओबामा प्रशासन को कहा था कि पाकिस्तान ‘सांप’ पालता है। हिलेरी ने भारत की ‘लुक ईस्ट’ नीति में ‘एक्ट ईस्ट’ जोड़ने का सुझाव भी दिया था। हिलेरी ने यूएसएआईडी प्रमुख के रूप में राज शाह और सहायक विदेश मंत्री के तौर पर रिचर्ड वर्मा जैसे भारतवंशियों को मंत्रालय में नियुक्त किया। वर्मा वर्तमान में भारत में अमेरिकी राजदूत हैं।
हिलेरी क्लिंटन ने चीन से मुकाबला करने के लिए एशिया में ‘धुरी’ बनाने का सुझाव भी दिया था। क्लिंटन एशिया में अपनी धुरी बनाने की नीति पर चलेंगी जिसका फायदा भारत को मिलना तय है। चीन को रोकने के लिए एशिया में अमेरिका की मौजूदगी भी भारत के हित में है। भारतीय मूल के अमेरिकी उद्योगपति फ्रैंक इस्लाम का कहना है कि हिलेरी भारत की अच्छी सहयोगी साबित होंगी। हिलेरी पहले भी भारत समर्थक अपनी छवि सार्वजनिक कर चुकी हैं।
भारत पर स्पष्ट नहीं ट्रंप का नजरिया
डोनाल्ड ट्रंप
रिपब्लिकन प्रत्याशी डोनाल्ड ट्रंप चूंकि मुख्य रूप से वह एक व्यापारी हैं इसलिए उन्हें वैश्विक मामलों, नाटो या कश्मीर जैसे मामलों की जानकारी कम ही है। ओबामा प्रशासन की नीतियों के खिलाफ उन्होंने वर्तमान अमेरिकी सहयोगियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि एशिया में सत्ता समीकरण से जो जगह खाली होगी उसे चीन से भर सकते हैं। इस लिहाज से ट्रंप भारतीय हितों के खिलाफ हैं। लेकिन उन पर जब एनआरआई का दबाव पड़ा तो रिपब्लिकन हिंदू कोएलिशन की रैली में वह बोले कि राष्ट्रपति चुने जाने पर वह भारत के सबसे अच्छे दोस्त साबित होंगे।
कश्मीर पर ट्रंप ने भारत और पाक के बीच मध्यस्थता की पेशकश कर दी। भारत के अच्छे दोस्त बनकर उनकी कश्मीर पर मध्यस्थता की बात भी भारतीय हितों के खिलाफ है। यानी भारत को लेकर ट्रंप का नजरिया अस्पष्ट है जिसका एक बड़ा कारण उनमें अनुभव की कमी भी कही जा सकती है। उन्होंने 23 अप्रैल को एक भारतीय कॉल सेंटर कर्मी के अंग्रेजी में बात करने के लहजे की नकल उतारते हुए उसका मजाक भी उड़ाया था।
वीजा, बौद्धिक संपदा, व्यापार व प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर रोक भारत के खिलाफ
हालांकि अमेरिका भारत के साथ मजबूत संबंध बनाने का पक्षधर है, लेकिन भारत संबंधी कई मामलों पर ट्रंप और हिलेरी की राय एक जैसी है। इनमें सबसे बड़ा मुद्दा है भारत के लिए अमेरिका में अस्थायी रूप से काम करने वालों को दिया जाने वाला एच 1-बी वीजा। अमेरिका में ट्रंप और हिलेरी दोनों ही अमेरिकियों को मिलने वाली नौकरियां भारतीयों को सस्ते वेतन पर मिलने से परेशान हैं। ट्रंप ने इस नीति को बदलकर विदेशियों को ज्यादा वेतन देने की बात कही, तो हिलेरी ने इसे दुखद बताते हुए वीजा पर काम करने वालों को प्रशिक्षण देने का नरम रवैया अपनाया। ट्रंप पर दबाव पड़ा तो उन्होंने भी नरम रवैया अपनाया, लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद यह नीति भारत के पक्ष में रहना मुश्किल होगा।
इसके अलावा बौद्धिक संपदा की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी दोनों प्रत्याशी कड़ा रुख जारी रख सकते हैं। अमेरिकी दवा कंपनियां भारत के पेटेंट नियमों में बदलाव चाहती हैं। इनसे भारत में जेनेरिक दवा बनाने वाली कंपनियों को बड़ा नुकसान होगा। इसके अलावा अवरोध पैदा करने वाली कारोबारी नीतियों, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर रोक जैसे मसलों पर भी रिपब्लिकन व डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों की राय एक जैसी है जो भारत के खिलाफ है।