अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इस्राइल समर्थक लॉबी की तरफ से जबरदस्त दबाव के बावजूद ओबामा प्रशासन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के उस प्रस्ताव को मंजूर होने दिया जिसमें इस्राइल द्वारा विवादित क्षेत्र में बस्तियों के निर्माण की निंदा की गई थी। अमेरिका पर इस निंदा प्रस्ताव को वीटो द्वारा रोकने का दबाव था।
हालांकि इस्राइली पीएम कार्यालय ने ओबामा प्रशासन पर संयुक्त राष्ट्र से मिली भगत का आरोप लगाया और ट्रंप के साथ मिलकर काम करने का बयान दिया है, जबकि दूसरी तरफ ट्रंप ने भी ओबामा प्रशासन की निंदा करते हुए ट्वीट किया कि 20 जनवरी को उनके पद ग्रहण करने के बाद स्थितियां बदलेंगी।
अमेरिका द्वारा प्रस्ताव के खिलाफ वोट नहीं करना उस नीति में दरार मानी जा रही है जिसके तहत अब तक इस्राइल द्वारा फलस्तीन में बस्तियों की बसाहट को अवैध न मानकर अमेरिका उसे समर्थन देता रहा है। अमेरिका का यह कदम उसके निकटतम सहयोगी को कूटनीतिक फटकार वाला माना जा रहा है।
फलस्तीन क्षेत्र में इस्राइली बस्तियों को रोकने वाली मांग का यह प्रस्ताव मिस्र ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रखा था। वोटिंग से 2 दिन पहले ही एक इस्राइली अधिकारी ने अमेरिका पर इस्राइल को मंझधार में छोड़ने का आरोप लगाया था। दरअसल अमेरिका यदि वीटो अधिकार का उपयोग करता, तो प्रस्ताव खारिज हो जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
इस्राइल को लेकर ट्रंप ने तोड़ी परंपरा
फलस्तीन इलाकों में इस्राइली बस्तियों का समर्थन करने वाले अमेरिका के इस फैसले का कारण ओबामा व इस्राइली पीएम नेतन्याहू के बीच चल रही नाराजगी को भी माना जा रहा है। जबकि दूसरी तरफ ओबामा के इस फैसले का नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने विरोध किया है। उन्होंने कहा कि जिस जमीन पर यहूदी बसावट को लेकर इस्राइल के खिलाफ प्रस्ताव पारित हुआ है उसे इस्राइल ने 1967 के युद्ध में जीता था, इसलिए यहां बस्तियां बसाने का उसे अधिकार है।
उधर ओबामा प्रशासन के इस कदम से फलस्तीन में खुशी की लहर है। फलस्तीन के एक नेता ने कहा, यह हमारे लोगों और हमारे मकसद की जीत है। इस्राइली बस्तियों पर प्रतिबंध लगाने की हमारी मांगों के लिए यह वोटिंग नया दरवाजा खोलेगी।
इस्राइल को लेकर ट्रंप ने तोड़ी परंपरा
सुरक्षा परिषद ने इस्राइल के खिलाफ जिस प्रस्ताव को 14 मतों से मंजूर किया उसमें अमेरिका मतदान से गायब रहा। जबकि इसके खिलाफ वीटो इस्तेमाल का दबाव न केवल इस्राइल, बल्कि खुद ट्रंप ने भी डाला।
ट्रंप 20 जनवरी को राष्ट्रपति का पद संभालेंगे लेकिन उन्होंने अमेरिका की उस परंपरा को भी तोड़ दिया जिसके तहत जब तक नया राष्ट्रपति अपना कार्यभार नहीं संभाल लेता, तब तक वह पुराने राष्ट्रपति के काम-काज में खुलकर दखल नहीं देता है। ट्रंप ने इस परंपरा को सार्वजनिक तौर पर तोड़ा और ओबामा प्रशासन को वीटो अधिकार के इस्तेमाल की हिदायत दी।
ओबामा ने भी मरोड़ दिया इतिहास
बराक ओबामा 20 जनवरी को रिटायर हो रहे हैं। उन्होंने यह कदम उठाकर अमेरिका द्वारा इस्राइल की ढाल बने रहने का इतिहास मरोड़ दिया है। इस्राइल को हर साल अमेरिका ढाई हजार अरब से अधिक की सैन्य सहायता देता है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य होने के कारण अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन के पास किसी प्रस्ताव या फैसले के खिलाफ वीटो अधिकार इस्तेमाल करने का अधिकार है। इनमें से किसी भी देश द्वारा वीटो किए जाने पर वह प्रस्ताव मंजूर नहीं हो पाता है। और अमेरिका ने हमेशा इस्राइल के लिए इसका इस्तेमाल किया था।
ओबामा से नाराज है इस्राइल, लेकिन ट्रंप से उम्मीद
ओबामा से नाराज है इस्राइल, लेकिन ट्रंप से उम्मीद
संयुक्त राष्ट्र में इस्राइल के राजदूत डेनी डेनन ने इस वोटिंग के बाद नाराजगी दिखाते हुए सख्त लहजे में कहा कि - ‘उम्मीद थी कि इस्राइल का सबसे बड़ा सहयोगी देश साझा मूल्यों का पालन करेगा और इस शर्मनाक प्रस्ताव के खिलाफ अमेरिका वीटो करेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ जो गलत था।’
उधर नेतन्याहू ने ओबामा प्रशासन पर संयुक्त राष्ट्र से मिली-भगत का आरोप लगाते हुए कहा कि इस्राइल अब ट्रंप के साथ मिलकर काम करने का इंतजार कर रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि नए अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य इस्राइल के साथ दोस्ताना रवैया अपनाएंगे।
इसलिए आई ओबामा व नेतन्याहू के बीच दरार
ओबामा लंबे समय से ‘टू-स्टेट’ नीति के तहत इस्राइल और फलस्तीन के बीच समस्या का हल निकालने की कोशिश कर रहे थे। वह चाहते थे कि इस्राइल के साथ एक आजाद फलस्तीन देश भी बनाया जाए और दोनों का अस्तित्व कायम रहे। नेतन्याहू का रवैया ओबामा की इस कोशिश के आड़े आ रहा था।
इसी मामले पर ओबामा का नेतन्याहू के साथ लगातार विरोध बना रहा। ओबामा प्रशासन इस्राइली बस्तियों के लगातार प्रसार को लेकर नाराज था। फलस्तीन का आरोप है कि इस्राइल जमीन पर निर्माण कर तथ्यों को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर रहा है, जबकि यह जमीन फलस्तीन की थी।