फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

क्या खब्बू लोग जल्दी मरते हैं?

Mon, 09 Sep 2013 05:38 PM IST
हैना बार्न्स
विज्ञापन
विज्ञापन
कहा जाता है कि दाएं हाथ का इस्तेमाल करने वाले लोग बाएं हाथ का इस्तेमाल करने वालों से नौ साल ज्यादा जीते हैं। बाएं हाथ का इस्तेमाल करने वाले यानी खब्बू माता-पिता की बेटी होने और खब्बू भाई की बहन होने के नाते मेरे लिए यह चिंता में डालने वाला ख्याल है। मगर क्या इसमें सच है भी?
विज्ञापन


1980 के दशक के आखिर और 1990 के दशक की शुरुआत में अमेरिकी मनोवैज्ञानिकों डाएन हैल्पर्न और स्टेनले कॉरेन ने अपने दो लेखों के जरिए इसकी पड़ताल की। दोनों लेख काफी जाने माने वैज्ञानिक जर्नल्स नेचर और न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में छपे थे।

मगर खब्बू लोगों की अकाल मृत्यु की क्या संभावित व्याख्या हो सकती है?

क्या इसकी वजह यह है कि उनके हाथ-पैर कुदरत के रवैये के विपरीत काम करते हैं?

दक्षिण इंग्लैंड के हैंपशायर की क्लेयर एलेन कहती हैं, ‘चाकू बेहद भौंडी चीज हैं। ये सीधे हाथ वालों के हिसाब से बनाए गए हैं। अगर आप उसे बाएं हाथ से इस्तेमाल में लाते हैं तो वो हमेशा तिरछा काटते हैं, जबकि सीधे हाथ से काम करने वाले के लिए ये सीधा काटते हैं।’
विज्ञापन


मुझे पता है कि मेरी मां बाएं हाथ वाली सिलाई कैंचियों के बिना अक्सर परेशान हो जाया करती थीं। मगर ऐसी चीजें किसी इंसान की उम्र करीब एक दशक तक कम करने के लिए ज़िम्मेदार नहीं हो सकतीं।

‘यह बिल्कुल सच नहीं’
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में मनोविज्ञान के प्रोफेसर और ‘राइट हैंड, लैफ्ट हैंड’ के लेखक क्रिस मैकमैनस कहते हैं, ‘यह बिल्कुल सच नहीं है।’

‘अगर यह सच होता तो यह किसी इंसान की उम्र तय करने का सबसे बड़ा पैमाना होता। यह बिल्कुल ऐसा होता जैसे आप एक दिन में 120 सिगरेट पी रहे हैं और दूसरे कई खतरनाक काम भी एक साथ कर रहे हैं। यह बिल्कुल अविश्वसनीय है कि किसी महमारी की जांच करने वाले वैज्ञानिक को कभी इसका पता ही न चला होता।’

अगर यह इतना अविश्वसनीय है तो इतने स्थापित शैक्षणिक जर्नल्स में ये लेख क्यों छापे गए और यह मिथक अब तक जारी क्यों है?

क्रिस मैकमैनस के मुताबिक इसकी वजह है कि शोधकर्ताओं ने ‘बेहद सूक्ष्म गलती’ की थी।

शोधकार्य दक्षिणी केलीफोर्निया में हुआ था जहां हर मृत शख्स की सूची मौजूद है।

हैल्पर्न और कॉरेन ने उन लोगों की सूची ली जिनकी हाल ही में मौत हुई थी और उनके परिवारों से संपर्क किया। उनसे पूछा गया कि उनके रिश्तेदार दाएं या बाएं हाथ से काम करते थे।

क़रीब दो हजार मामलों में उन्होंने पाया कि बाएं हाथ से काम लेने वालों यानी खब्बुओं की मौत के वक्त औसत उम्र दाएं हाथ से काम लेने वालों के मुकाबले करीब नौ साल कम थी। इस आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि खब्बू जल्दी मौत का शिकार बने।

शोधकर्ताओं ने की गलती
पहली नजर में यह बात काफी समझदारी की लगती है। तो फिर शोधकर्ताओं ने गलती कहां की?

क्रिस मैकमैनस कहते हैं, ‘उनकी गलती यह थी कि उन्होंने सिर्फ मृतकों के आंकड़ों की बात की।’

अहम बात यह है कि आज खब्बू लोगों की संख्या पहले के मुकाबले ज्यादा है, इसलिए जब यह शोध छपा था तो खब्बू लोग औसतन दाएं हाथ वालों के मुकाबले छोटे थे।

‘बाएं हाथ से काम करने वालों की क़ुदरती दर 10-11 फीसदी है, मगर विक्टोरियन युग में इसे कृत्रिम तौर पर कम कर दिया गया था।’

क्रिस मैकमैनस कहते हैं, ‘आप 1800 से 1900 के बीच इसे गिरता हुआ पाते हैं।’

इस काल में खब्बुओं को आगे बढ़ने से रोका तो गया ही, उनके लिए जिंदगी काफी मुश्किल भरी थी और वो जल्द ही विशिष्ट हो गए।

मैकमैनस बताते हैं, ‘फैक्ट्रियों में वो उन मशीनों पर काम करते थे जो सीधे हाथ वालों के लिए बनाई गई थीं और बाएं हाथ से काम लेने वालों को यह अजीब लगता था।’

‘इसके बाद अनिवार्य स्कूलिंग शुरू हुई। उन्हें कक्षाओं में बैठने तो दिया गया पर उन्हें सीधे हाथ से स्याही वाले पैन से लिखने को कहा जाता था और वो उसे गड़बड़ कर देते थे। नतीजा यह हुआ कि खब्बू लोगों को कलंकित किया जाने लगा और उन्हें मूर्ख समझा जाने लगा।’

इसलिए केलीफोर्नियाई सूचियों में दर्ज मृतकों में से कई खब्बू बेशक पैदा हुए हों मगर उन्होंने अपना ज्यादातर जीवन दाएं हाथ के लोगों की तरह काम करने और दिखने की कोशिश में बिताया था। जब शोधकर्ता उनके परिवारों के पास पहुंचे तो उन्होंने भी उनके बारे में ऐसे ही ख्याल जताए थे।

इसके चलते शोधकर्ताओं के नतीजे गड़बड़ हो गए।

20वीं सदी में बढ़े खब्बू
इसकी वजह समझने के लिए थोड़ी देर के लिए आप मान लें कि 40 साल पूर्व यानी 1973 से पहले कोई खब्बू पैदा नहीं हुआ।

अब अगर हम 2013 का मृत्यु रिकॉर्ड देखें और जानने की कोशिश करें कि इनमें से कौन इंसान खब्बू था तो हमें पता चलेगा कि इनमें से सभी करीब 40 साल की उम्र में या उससे पहले मर गए। यह दाएं हाथ वालों की मौत के समय उम्र से काफी कम होगा।

असल में ऐसी स्थिति कभी वास्तव में सामने नहीं आई है - लेकिन 20वीं सदी में खुद को खब्बू कहने वाले लोगों की तादाद अचानक तेजी से बढ़ी है।

इसलिए यह मानना कि खब्बू यानी बाएं हाथ का प्रयोग करने वाले दाएं वालों के मुकाबले नौ साल पहले मर जाते हैं एक मिथक है।

ऐसे में कम घातक चोटों के बारे में क्या कहेंगे? क्या हमें क्लेयर एलन जैसे लोगों के बारे में चिंतित होना चाहिए जो अपनी रसोई में उन चाकुओं से जूझते हैं जिन्हें सीधे हाथ वालों के हिसाब से बनाया गया है?

क्रिस मैकमैनस कहते हैं, ‘कुछ सुबूत मौजूद हैं कि बाएं हाथ से काम करने वाले अपेक्षाकृत छोटी दुर्घटनाओं के ज्यादा शिकार होते हैं। मगर यह पर्याप्त नहीं है और मुझे संदेह है कि इसका मृत्युदर पर कोई बहुत बड़ा असर होता होगा।’
विज्ञापन


और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें