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विदेशी शोधकर्ताओं का खुलासाः 500 सड़कों के निर्माण के लिए भुगतान हुआ, लेकिन वे बनी ही नहीं

Fri, 12 Jan 2018 01:54 AM IST
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PMGSY
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अमेरिका और फ्रांस के शोधकर्ताओं ने भारत सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) में भ्रष्टाचार को उजागर किया है। उनके अनुसार इस योजना में जिन 500 सड़कों को बनाने के लिए भुगतान किया जा चुका है उनका निर्र्माण ही नहीं हुआ।
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देश के दूरदराज के इलाकों को शेष भाग से जोड़ने के लिए शुरू की गई इस योजना के बारे में यह खुलासा अमेरिका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी और फ्रांस के पेरिस स्कूल ऑफ इकोनामिक्स के शोधकर्ताओं ने किया है। उनका यह शोध जर्नल ऑफ डेवलपमेंट इकोनामिक्स में प्रकाशित हुआ है।

इस शोध का नेतृत्व कर रहे प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जैकब एन शेपिरो ने कहा कि इस योजना में भ्रष्टाचार के कारण 8 लाख 57 हजार ग्रामीण प्रभावित हुए जिनके लिए वे सड़के बनाई जानी थी। वर्ष 2000 में शुरू की गई इस योजना के तहत देशभर के तीन लाख गांवों को हर मौसम में काम आने वाली सड़कों से जोड़ा जाना था। शोधकर्ताओं ने इस योजना में भ्रष्टाचार पर हैरानी जताई क्योंकि इसमें भ्रष्टाचार को रोकने के लिए हर संभव उपाय किए गए थे।
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कैसे जुटाए सबूत
पीएमजीएसवाई में भ्रष्टाचार के सबूत जुटाने के लिए शेपिरो और उनकी टीम ने विधानसभा चुनावों में जीते उम्मीदवारों से संबंधित आंकड़ों को खंगाला। उन्होंने पता लगाया कि नए विधायक के चुने जाने के बाद इस योजना के तहत कितनी सड़कों के ठेके उस जनप्रतिनिधि के सरनेम वाले ठेकेदारों को स्थानांतरित किए गए। नतीजा काफी चौंकाने वाला था। मालूम हुआ कि चुनाव के बाद नवनिर्वाचित विधायकों के सरनेम वाले ठेकेदारों की संख्या 75 फीसदी से ज्यादा हो गई। जबकि चुनाव से पहले उनकी संख्या चार से सात फीसदी तक थी।
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नौकरशाहों की मिलीभगत की आशंका

प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना - फोटो : Demo
90 हजार सड़कों की जांच
शोधकर्ताओं ने ठेकेदारों के बाद इस योजना के तहत बनाई गई 90 हजार सड़कों से संबंधित आंकड़ों की जांच की। उन्हें पता चला कि जिन सड़कों का कभी निर्माण ही नहीं हुआ, उनमें से ज्यादातर ठेके राजनीतिक दबदबा रखने वाले ठेकेदारों को दिए गए थे।

नौकरशाहों की मिलीभगत की आशंका
हालांकि इस योजना में सड़कों और ठेकेदारों के चयन में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की कोई भूमिका नहीं थी। ये सारे निर्णय नौकरशाही को लेना था। ऐसे में सवाल उठता है कि भ्रष्टाचार कैसे हुआ? इसके जवाब में शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत में जनप्रतिनिधियों और नौकरशाहों में जातीय और क्षेत्रीय पहचान के आधार पर नजदीकी संबंध कायम हो जाते हैं।

इन्हीं संबंधों का फायदा उठाकर जनप्रतिनिधियों ने अपने खास लोगों को ये ठेक दिलवाने में अहम भूमिका निभाई। शोधकर्ताओं के अनुसार चुनाव जीतने वाले राजनेता और नौकरशाह का सरनेम एक होने पर योजना में भ्रष्टाचार की संभावना ज्यादा पाई गई।
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