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अमेरिकी भारतीयों पर क्या गुजर रही है?

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अमेरिका में कामबंदी के ऐलान से अमेरिकी लोगों के साथ ही साथ वहां काम करने वाले भारतीय मूल के लोगों के लिए भी मुश्किलें खड़ी हो गई है।
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अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की सरकार और विपक्ष में मौजूद रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों के बीच बजट को लेकर गतिरोध के चलते अमेरिकी में सरकार का कामकाज ठप है।

सात लाख से अधिक सरकारी  कर्मचारियों को छुट्टी पर भेज दिया गया है। राष्ट्रीय उद्यानों, संग्रहालयों, संघीय इमारतों और सरकारी सेवाओं को बंद कर दिया गया है।
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अमेरिकी में वाशिंगटन और वर्जीनिया जैसे राज्यों में हजारों की संख्या में भारतीय मूल के लोग रहते हैं।

आप्रवासी नागरिक

भारतीय मूल के अमेरिकी या तो अमेरिका की केंद्रीय सरकार के लिए काम करते हैं, या फिर ऐसी कंपनियों के लिए काम करते हैं जो अमेरिकी सरकार के लिए काम करती हैं। दोनों ही सूरतों में उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

भारतीय मूल के संजय राय 30 साल पहले भारत से अमरीका आ गए थे। आजकल वे वाशिंगटन के मेरीलैंड में रहते हैं।

संजय विदेश मंत्रालय के साथ काम कर चुके हैं। उनके परिवार के कई लोग और कई दोस्त अमेरिकी सरकार के लिए काम करते हैं।

कामबंदी के असर के बारे में संजय रॉय का कहना है,"कामबंदी का असर तो पूरे समुदाय पर पड़ता है। लेकिन अप्रवासी नागरिकों या जो अप्रवासी होने की प्रक्रिया में हैं, उनपर ज़्यादा असर पड़ता है।"

संजय कहना है, "सरकारी कामकाज ठप होने के कारण पासपोर्ट ऑफिस बंद है।

किसी का पासपोर्ट यदि खत्म हो रहा हो, और उसे किसी बीमार को देखने जाना हो तो आप नहीं जा सकते। यदि यहां कोई आना चाहता है तो वो भी मुश्किल है, क्योंकि उसे समय पर वीजा नहीं मिल सकता है।"

बच्चों को परेशानी

अमेरिका के विभिन्न राज्यों में करीब 30 लाख से ज़्यादा भारतीय मूल के लोग बसे हुए हैं। भारतीय मूल की अर्चना भटनागर अमरीका के नेवादा राज्य में रहती हैं।

ये वही नेवादा राज्य है जहां से सीनेट में डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता हैरी रीड भी आते हैं।

अर्चना भटनागर कहती हैं, "मुझे ताज्जुब है कि कामबंदी कैसे हो गई। ओबामा ने सोचा था कि बजट पारित हो जाएगा, मगर ऐसा नहीं हुआ। अब लोगों को तो परेशान होगी ही।"

वे अपनी बात पूरी करते हुए कहती हैं, "बच्चे गर्मियों में चिड़ियाघर जाते हैं। और भी कई जगह घूमने-फिरने जाते हैं। अभी सब बंद है। जनता बहुत परेशान है।"

बहुत से लोग ऐसे हैं जो एचवन-एलवन वीजा पर काम करने भारत से अमेरिका आए हुए हैं।

वे निजी कंपनियों के ज़रिए अमरीकी सरकार के प्रोजेक्ट्स पर काम करते हैं। उन पर भी कामबंदी का असर हो रहा है।

संजय रॉय ने बताया कि सरकार का कामकाज बंद होने अस्थायी वीजा, ग्रीन कार्ड, लेबर सर्टिफिकेशन जैसे आवेदनों पर असर पड़ रहा है।

इसके अलावा वे कहते हैं कि आप्रवासी लोगों को ज्यादा मुश्किल होती है क्योंकि उनकी छुट्टियां हमेशा मौज मस्ती के लिए नहीं कई बार बेहद जरूरी कामों के लिए भी होती हैं।

कामबंदी के कारण कुल 21 लाख सरकारी कर्मचारियों में से 10 लाख कर्मचारियों को घर बैठने के लिए कहा गया है। इनमें करीब चार लाख कर्मचारी रक्षा विभाग से हैं।

कामबंदी के अलावा इन लोगों की इस की भी चिंता है कि इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि काम पर वापस बुलाए जाने के बाद भी उन्हें इस अरसे की तनख्वाह मिलेगी।
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असहमति जारी है

वाशिंगटन और अन्य शहरों में कई केंद्रीय दफ्तरों में जब सुबह कर्मचारी पहुंचे तो उन्हें कामबंदी का नोटिस मिला।
सुबह सुबह ही कई सरकारी इमारतों से हज़ारो की संख्या में कर्मचारी बाहर निकलते हुए देखे गए।

वाशिंगटन जैसे इलाकों में जहां केंद्रीय सरकार के ही अधिकतर दफ्तर हैं और जहां दिन भर भीड़ रहती है अब वहां सन्नाटा पसरा है।

कामबंदी के जल्द ख़ात्मे के भी कोई आसार नहीं दिख रहे हैं।

अमेरीका राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस संकट से निपटने की कोई पहल तो नहीं की है, मगर विपक्षी रिपब्लिकन पार्टी से इस मामले में बातचीत की पेशकश जरूर की है।

लेकिन अमेरिकी कांग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य इस बात के लिए राज़ी नहीं हो रहे हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं संबंधित कानून में कोई बदलाव किए बगैर वो खर्चों के बिल को मंजूर कर दें।
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