अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि वो ये भूल जाते हैं कि दवा कब लेनी है।
कभी-कभी यह दिक्कत तब बड़ी हो जाती है, जब घर में कोई बुजुर्ग हों और गंभीर बीमारी से पीड़ित हों और जिनके लिए दवा में चूक घातक हो सकती है।
अमेरिका में कैलिफोर्निया की प्रोटियस डिजिटल हेल्थ कंपनी ऐसी दवाओं का परीक्षण कर रही है, जो पेट में पहुंचते ही डॉक्टर को सारी जानकारी भेज देती है।
इनके लिए खास ऐप को तैयार किया गया है। इसका इस्तेमाल किसी स्मार्टफोन, कंप्यूटर या टैबलेट के जरिए किया जा सकता है। डॉक्टर या परिवार के सदस्य को ये पता चल जाता है कि मरीज ने दवा निगल ली है।
ये सारा काम करता है एक छोटा सा सेंसर, जो दवा की गोली के अंदर होता है।
'मैं दूसरी गोली हूं'
प्रोटियस के चीफ एक्जिक्यूटिव एंड्रयू थॉमसन का कहना है, ''हमने दो ऐसी धातुएं लीं, जो भोजन का हिस्सा होती हैं। इन्हें रेत के एक नन्हे से कण पर रखा जाता है और दवा से इस तरह जोड़ा जाता है कि आप जब ये दवा लें, तो आप एक आलू की तरह काम करें।"
यहां आयनिक घोल पेट के एसिड होते हैं। इससे इतनी बिजली पैदा होती है, जो सेंसर के लिए काफी होती है। सेंसर एक ऐसे पैच के संपर्क में रहता है जिसे मरीज ने पहना होता है।
ये सेंसर मरीज की गति, नींद और दूसरे अहम संकेतों पर भी नजर रखता है। यही पैच सारी जानकारी ऐप को भेजता है।
थॉमसन का कहना है, "जब आप हमारी डिजिटल दवा लेंगे, तो वो कहेगी कि हैलो मैं यहां हूं। मैं नोवार्टिस हूं। मैं डायोवैन हूं। 1.2 एमजी, मैं 76 नंबर प्लांट से हूं। मेरा बैच नंबर 12 है और मैं दूसरी गोली हूं।''
यह ऐप दवा के असर पर भी नजर रखती है। यह बताती है कि दवा की सही मात्रा ली गई या नहीं या यह काम कर भी रही है या नहीं। ब्रिटेन में लॉयड फार्मेसी इस तकनीक का परीक्षण कर रही है।
मरीजों को सेंसर वाली एक गोली के साथ लेबल लगी एक ट्रे मिलती है, जिसमें सभी डोज होती हैं।
गलत ढंग से दवा लेने वाले 50%
थॉमसन का कहना है कि "अगर हायपर टेंशन से परेशान कोई मरीज दवा नहीं लेता, तो कुछ वक्त बाद इसका मतलब होता है दिल का दौरा। इसका लाखों डॉलर का खर्च स्वास्थ्य तंत्र को उठाना पड़ेगा, जबकि दवा का हर महीने का खर्च सिर्फ 30 पेंस है। यानी सही ढंग से दवा लेने में मदद करने का मतलब होगा लाखों पौंड की बचत।"
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ 50% लोग दवा ठीक तरीके से नहीं लेते। इसके अलावा 50% से ज्यादा दवाएं या तो डॉक्टर गलत ढंग से देने की सलाह देते हैं या उन्हें कैमिस्ट गलत ढंग से बेचते हैं या उनका गलत ढंग से सेवन किया जाता है।
न सिर्फ मरीजों के लिए इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं बल्कि स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने वालों के लिए भी इसका मतलब करोड़ों का खर्च होता है।