जब बिली ग्राहम 17 साल के थे
जब अमेरिका में साल 1933 में शराबबंदी खत्म हुई तो बिली ग्राहम के पिता ने उन्हें बियर पीने के लिए मजबूर किया। लेकिन बिली ने आखिरी दम तक अपने पिता को शराब के खतरों से आगाह करने की कोशिश की। बिली ने ताउम्र शराब को हाथ नहीं लगाया।
जब वो सोलह साल के थे तो उन्होंने खुद को क्राइस्ट के प्रति समर्पित कर दिया। 1939 में वो पादरी बन गए। द्वितीय विश्व युद्ध के समय वो सेना में पादरी का काम करना चाहते थे लेकिन मम्प्स (गल गंड रोग) के कारण उनका ये ख्वाब अधूरा रह गया।
1943 में वो फ्लोरिडा बाइबल इंस्टीट्यूट चले गए और रथ मैक्यू बेल से शादी कर ली। इसके बाद वो एक पूर्ण कालिक धर्म उपदेशक बन गए। नौजवान लोगों को पादरी बनने के लिए प्रेरित करना उनका काम था।
लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब बिली ग्राहम ने सेल्समैन का काम किया। वो मंदी का समय था और बिली घूम-घूम कर सामान बेचा करते थे। तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि ये शख्स एक दिन ईसाई धर्म के महान प्रचारकों में शुमार होगा।
साल 1949 में दुनिया की नजर उस वक्त बिली ग्राहम पर गई जब वो आठ हफ्तों तक लॉस एंजीलिस में एक विशाल टेंट के नीचे लोगों को उपदेश देते रहे। नागरिक अधिकार आंदोलन के बढ़ते असर से मजबूर होकर बिली ग्राहम ने अमरीकी समाज में जारी नस्लवाद का विरोध करना शुरू किया।
शुरुआत में बिली ग्राहम बदलाव की जरूरत को लेकर दुविधा में थे लेकिन पचास के दशक की शुरुआत में उन्होंने ऐसे माहौल में उपदेश दिए थे जहां नस्ल के आधार पर लोगों के बैठने का इंतजाम था। तभी कोर्ट ने ये फैसला दिया कि अमरीकी स्कूलों में नस्ल के आधार पर अलग-अलग बैठने की व्यवस्था असंवैधानिक है।
इसके बाद ग्राहम ने अपनी मीटिंग्स में लोगों के साथ बैठने पर जोर देना शुरू कर दिया। वो साम्यवाद के मुखर विरोधी थे। बिली ग्राहम का ये मानना था कि साम्यवाद ईश्वर, क्राइस्ट व बाइबल और सभी धर्मों के खिलाफ है। अमेरिका में मिली कामयाबी के बाद बिली अपना संदेश दुनिया भर में फैलाना चाहते थे और इसकी शुरुआत उन्होंने 1954 में लंदन से की।
ये एक सोच-समझ कर लिया गया जोखिम था। उस जमाने में केवल 10 फीसदी ब्रितानी ही नियमित रूप से चर्च जाते थे जबकि अमेरिका में ये तादाद 50 फीसदी थी। ब्रिटेन का प्रेस भी उनको लेकर संशकित था। लोग ये समझ नहीं पा रहे थे कि ये अमरीकी आखिर चाहता क्या है।
एक सांसद ने उनके ब्रिटेन में दाखिल होने पर रोक लगाने की मांग तक कर डाली। लेकिन तब भी उन्होंने लंदन में 12 हजार लोगों की भीड़ को संबोधित किया।
ब्रिटेन में उनकी दीवानगी इस कदर देखी गई कि तीन महीनों तक हर रात 12000 लोगों की क्षमता वाला ऑडिटोरियम भरा रहा। बिली के ब्रिटेन अभियान का आखिरी पड़ाव वेंबली स्टेडियम था जहां उन्हें सुनने के लिए 120000 लोग इकट्ठा हुए थे। बिली की वैश्विक यात्रा की ये शुरुआत थी।
उनके धार्मिक अभियान की योजनाएं बेहद सतर्कतापूर्वक बनाई जाती थीं। जैसे-जैसे बिली की इज्जत बढ़ी, उन्हें सुनने आने वालों की तादाद भी। न्यूयॉर्क से लेकर नाइजीरिया तक जाने कितने लोग उनसे प्रभावित थे। कोरिया में दस लाख से ज्यादा लोग उन्हें सुनने के लिए इकट्ठा हो गए थे।
1957 में उन्होंने सिविल राइट मूवमेंट के नेता मार्टिन लूथर किंग को न्यूयॉर्क में अपने साथ शामिल होने के लिए न्योता दिया। 16 हफ्तों तक चले इस इवेंट में 20 लाख से ज्यादा लोग उन्हें सुनने के लिए आए। लेकिन ग्राहम और मार्टिन लूथर किंग के रिश्तों में उतार-चढ़ाव आता रहा।
वियतमान युद्ध पर मार्टिन लूथर किंग के स्टैंड को लेकर बिली ने उनकी आलोचना की और यहां तक कि उनकी देशभक्ति पर भी सवाल उठाए।
लेकिन 1968 में जब मार्टिन लूथर किंग की हत्या कर दी गई तो बिली खुद को भावुक होने से रोक नहीं सके। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने एक 'सोशल लीडर' और 'ईश्वर का दूत' खो दिया। 60 सालों तक बिली लोगों को उपदेश देते रहे। साल 2005 के जून में उन्होंने न्यूयॉर्क में आखिरी बार उपदेश दया। तब वो 86 साल के थे। उन्होंने कहा भी, "मैं जानता हूं कि ये ज्यादा समय तक नहीं चलने वाला है।"
दूसरे नामचीन पादरियों के विपरीत विवाद हमेशा बिली ग्राहम से दूर रहे। वो तकरीबन हर अमरीकी राष्ट्रपति के साथ देखे गए। बिली ने निक्सन का समर्थन किया था लेकिन वाटरगेट स्कैंडल में वो उनकी आलोचना करने से पीछे नहीं हटे।
1972 में रिचर्ड निक्सन के साथ निजी बातचीत में उन्होंने यहूदियों के लेकर नकारात्मक टिप्पणी की थी। ये टेप्स बाद में सार्वजनिक हुए तो 2002 में उन्होंने इसके लिए सार्वजनिक तौर पर माफी मांगी थी। लेकिन जो बात सबसे ज्यादा असर पैदा करती थी, वो उनके धार्मिक उपदेश थे और दुनिया भर के लाखों लोग इसके गवाह हैं।
उनका संदेश यही था कि उम्मीद की लौ जलती रही तो लोग ईश्वर के जरिये मोक्ष पा लेंगे। कभी उन्होंने कहा था, "मैंने बाइबल का आखिरी पन्ना पढ़ा है। आखिर में सबकुछ ठीक हो जाएगा।"