खगोलविदों ने पृथ्वी से 750 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर दो विशालकाय ब्लैक होल की खोज की है, जो एक-दूसरे की परिक्रमा कर रहे हैं। इन खगोलविदों में एक भारतीय मूल का विज्ञानी भी है। खगोलविदों कहना है कि इससे गुरुत्वाकर्षण तरंगों को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी कि कैसे गुरुत्वाकर्षण तरंगें बनते हैं।
पिछले साल शोधकर्ताओं की अंतरराष्ट्रीय टीम ने गुरुत्वाकर्षण तरंगों के अस्तित्व का पता लगाया था। इससे जर्मन भौतिकशास्त्री अल्बर्ट आइंस्टीन के 100 साल पुराने अवधारणा की पुष्टि होती है, जिससे वैज्ञानिक जगत हैरान है। ये गुरुत्वाकर्षण तरंगें अंतरिक्ष में 30 सौर समूहों के टकराने से बने दो नक्षत्रीय द्रव्य ब्लैक होल के नतीजे थे।
वैज्ञानिक अब इसे समझने का प्रयास कर रहे हैं कि कैसे दो विशालकाय ब्लैक होल आपस में टकराते हुए एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं, जिससे अंतरिक्ष समय की संरचना में तरंगों का निर्माण होता है। वैज्ञानिक आकाशगंगाओं के निर्माण में इन ब्लैक होल की भूमिका के बारे में अधिक से अधिक जानकारी जुटाना शुरू कर रहे हैं।
अमेरिका में यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मैक्सिकों के प्रोफेसेर ग्रेग टेलर ने कहा कि लंबे अर्से के बार हम दो विशालकाय ब्लैक होल को टकराते हुए देखा है और यह दो आकाशगंगाओं के विलीन होने का नतीजा है। शोधकर्ता 12 वर्षों से इन ब्लैक होल का अध्ययन कर रहे हैं।
एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में छपे इस अध्ययन के पहले लेखक कृषमा बंसल ने कहा कि जब डॉक्टर टेलर ने मुझे यह आंकड़े दिए तब मैंने इन तस्वीरों का अध्ययन करना और समझना शुरू कर दिया। ये आंकड़े 2003 के है। तब हमने पाया कि ये एक-दूसरे का चक्कर लगा रहे हैं।