अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दफ्तर में शपथ लेने के महज दो दिन पहले जर्मन गुस्से में हैं, चीन एकदम आपे से बाहर है, नाटो देशों के नेता नर्वस हैं और यूरोपीय यूनियन के सभी जोड़ीदार आशंकित हैं। इस बीच ट्रंप पूरी दुनिया के बारे में क्या सोचते हैं इसकी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। उनकी विवादित टिप्पणियों और परस्पर विरोधी साक्षात्कारों के चलते चीन के साथ तनाव पैदा हो चुका है। सिर्फ रूस और वहां के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के बारे में ट्रंप ने कोई आलोचना नहीं की है। इसके अलावा ट्रंप वास्तव में क्या करना चाहते हैं, यह कोई नहीं जानता।
वास्तव में देखा जाए तो ट्रंप की अस्थिरता ही शायद उनकी सबसे बड़ी विशेषता है। दुनिया को उनकी अधिकांश बातें ट्विटर के संदेशों द्वारा ही मिल रही हैं, लेकिन इनसे यह स्पष्ट नहीं होता है कि ये उनकी नई नीतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं अथवा निजी राय है।
मध्य-पूर्व देशों में आतंकवाद के खिलाफ लड़ रहे नाटो देशों में अमेरिका शामिल है, जबकि रूस इसके खिलाफ है ऐसे में रूस के साथ यदि अमेरिका संबंध बनाता है तो नाटो देशों को अपनी रणनीति दोबारा बनानी पड़ेगी। उधर इस्राइल को लेकर भी ट्रंप का रुख मध्य-पूर्व के देशों को प्रभावित करेगा।
चीन पहले ही वन चायना पॉलिसी को लेकर भी ट्रंप के बयानों से नाराज था, जबकि ताइवान को लेकर ट्रंप के रवैये से चीन और भी आग बबूला हो गया है। ट्रंप ने अपने पुराने नजरिए को दोहराते हुए एक बार फिर कहा है कि नाटो ‘अप्रासंगिक’ हो चुका है।
हालांकि उन्होंने जोड़ा कि नाटो मेरे लिए महत्वपूर्ण जरूर है। नाटो में राजदूत रह चुके और अमेरिकी विदेश मंत्रालय के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी आर. निकोलस बर्न्स ने कहा कि - ‘ट्रंप के ये बयान 1945 से अमेरिका द्वारा पश्चिमी नेतृत्व के साथ विकसित होने वाले सौहार्दपूर्ण संबंधों पर चोट करने वाले हैं।’