चेत कनोजिया ने जुगाड़ का पहला सबक़ सीखा जब क्रिकेट कमेंटरी सुनने के लिए भोपाल में वो और उनके दोस्त अपने कोट की जेब में ट्रांज़िस्टर छिपा कर क्लास में लाते थे।
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वही चेत कनोजिया आज मैनहैटन के अपने छोटे से दफ़्तर से एक ऐसी टेक्नॉलॉजी के ज़रिए अमेरिकी टेलीविज़न उद्योग के दिग्गजों की नींद हराम कर रहे हैं जो काफ़ी हद तक जुगाड़ की परिभाषा में फ़िट बैठती है। उन्होंने क्लाउड पर आधारित एक ऐसा मिनी एंटीना इजाद किया है जो टेलीविज़न सिग्नल्स को इंटरनेट के ज़रिए दर्शकों तक पहुंचाता है।
दर्शक इसे फ़ोन, टैबलेट, लैपटॉप और टीवी—लगभग हर उपकरण पर देख या रिकॉर्ड कर सकते हैं। नब्बे के दशक में अमेरिका आए कनोजिया का कहना है, “हमें लगा कि बदलते वक़्त के साथ हमें टीवी को ऑनलाइन कर देना चाहिए। टेलीविज़न को क्लाउड में रख देना कितना मज़ेदार होगा।”
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हर उपभोक्ता के नाम पर एक अठन्नी जितना बड़ी एंटीना उस शहर में एक बड़े से सेंट्रल बोर्ड में प्लग कर दिया जाता है। उपभोक्ता को न तो तार की ज़रूरत होती है न केबल बॉक्स की। सिर्फ़ एक यूज़र आईडी और पासवर्ड के ज़रिए वो जिस उपकरण पर चाहे ये चैनल देख सकता है।
टीवी नेटवर्क्स का आरोप
टीवी नेटवर्क्स उनकी कंपनी एरियो को अदालत में ले गए हैं और उनका आरोप है कि ये कंपनी उनके कार्यक्रम चुरा रही है। उनकी ये टेक्नॉलॉजी टीवी कंपनियों के लिए बड़ा ख़तरा साबित हो रही है क्योंकि इसका सीधा असर उनकी जेब पर हो रहा है।
दी इकॉनॉमिस्ट पत्रिका के अनुसार पिछले साल अमेरिका की चार बड़ी टेलीविज़न कंपनियों की कमाई सिर्फ़ केबल ऑपरेटरों के ज़रिए 1।3 अरब डॉलर की थी। कनोजिया कहते हैं कि उनका ये आविष्कार दर्शकों की बदलती आदत से प्रेरित है। लोग अब टैबलेट और लैपटॉप पर टीवी देख रहे हैं।
केबल के ज़रिए आज के दिन अमेरिकी दर्शकों को 400 चैनल्स का पैकेज लेना पड़ता है लेकिन देखते वो सिर्फ़ आठ या दस हैं। आधे से ज़्यादा दर्शक उन्हीं चैनलों को देखते हैं जो मुफ़्त उपलब्ध हैं और जिन्हें अमेरिकी क़ानून के तहत एंटीना के ज़रिए देखा जा सकता है लेकिन आमतौर पर एंटीना के ज़रिए तस्वीरों की क्वालिटी अच्छी नहीं मिलती।
एरियो अपने मिनी एंटीना को क्लाउड पर आधारित कर उच्च-क्वालिटी की तस्वीर दर्शकों तक पहुंचा रही है। सिर्फ़ आठ डॉलर प्रतिमाह के शुल्क पर। केबल कंपनियां इसके लिए 100 से 200 डॉलर तक वसूलती हैं। नेटफ़्लिक्स और हुलू जैसी कंपनियां इंटरनेट पर पूर्व प्रसारित कार्यक्रम तो दिखाती हैं लेकिन समाचार और स्पोर्ट्स का लाइव प्रसारण नहीं दिखा पातीं।
कॉपीराइट का मामला
कोलंबिया विश्वविद्यालय में कॉपीराइट क़ानून की जानकार जून बेसेक का कहना है कि टीवी नेटवर्क्स की नाराज़गी इस वजह से है कि एरियो उनके सिग्नल को पकड़ती है और उनका प्रसारण करती है लेकिन उसके बदले कोई पैसा नहीं देती।
अमेरिकी क़ानून के मुताबिक़ निजी इस्तेमाल के लिए ऐसा किया जा सकता है लेकिन सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए नहीं। एरियो का कहना है कि वो कोई केबल कंपनी नहीं है वो सिर्फ़ उपभोक्ताओं को टेक्नॉलाज़ी उपलब्ध करवा रही है,सिगनल पकड़ने के लिए और यही इस क़ानूनी विवाद की जड़ है।
कनोजिया कहते हैं कि उनके सामने अभी कई चुनौतियां हैं और क़ानूनी चुनौती सबसे बड़ी है। उन्होंने कहा, “लेकिन नई कंपनियों को इन चुनौतियों से लड़ने में ही मज़ा आता है।” उन्होंने अपनी पिछली कंपनी को पच्चीस करोड़ डॉलर में माइक्रोसॉफ़्ट को बेचकर अच्छा पैसा कमाया था। एरियो के लिए भी उन्हें काफ़ी वित्तीय मदद मिल रही है और अब वो तेरह अमेरिकी शहरों में मौजूद हैं।
उनका कहना है कि वो पढ़ाई-लिखाई में बहुत तेज़ तो नहीं थे लेकिन मेहनती थे। भोपाल में दोस्तों के साथ मौजमस्ती करना, क्रिकेट खेलना यही उनकी दिनचर्या थी। हँसते हुए वो कहते हैं, “नंबर 10 मार्केट हमारा अड्डा था और मैंने वो सब कुछ किया जो उस उम्र में लड़के करते हैं।”
भोपाल के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलॉजी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद वो अमरीका आ गए जहां उन्होंने कंप्यूटर सिस्टम्स इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। आज वो काम के पीछे पागल रहते हैं, मुश्किल से चार घंटे सोते हैं और शायद ही कोई सुबह होती हो जब वो अपनी दौड़ के लिए नहीं जाते हों। तो क्या ये सब पैसे के लिए है?
कनोजिया कहते हैं, “पैसा मैंने कमा लिया और मेरी ज़रूरतें भी बहुत सीमित हैं। लेकिन किसी उपलब्धि की परिभाषा इन दिनों पैसे में ही आंकी जाती है।” उनका कहना है, “शायद उपलब्धियों के लिए पैसे की जगह मेडल दिए जाते तो बेहतर होता क्योंकि पैसे की जो दूसरी बुराइयां हैं उनसे छुटकारा मिलता।”
मिल जाए तो पान और गुटका उन्हें अभी भी पसंद है लेकिन हिंदी फ़िल्मों से उनका नाता नहीं रहा। उन्होंने कहा, “अस्सी के दशक में जब अमिताभ बच्चन की चमक कम हो गई तभी से मैंने भी फिल्में नहीं देखीं। अब तो मुझे किसी का नाम भी नहीं मालूम।” लेकिन क्रिकेट का लगाव अभी भी बरकरार है।
उन्होंने पिछले विश्वकप का फ़ाइनल देखा था और कहते हैं: “कोई मुझे बताए कि मलिंगा जिस तरह से गेंद फेंकते हैं वो कौन से क्रिकेट क़ानून के तहत सही है।” क़ानूनी पेचीदगियों से उन्हें आने वाले दिनों में कई बार जूझना होगा जब अगले महीने सुप्रीम कोर्ट में एरियो के मामले की सुनवाई होगी।
वो चिंतित तो हैं लेकिन उनके अनुसार उनकी ज़िंदगी का मंत्र है: "मेरे लिए फल से कहीं ज़्यादा कर्म ज़रूरी है।”