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संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद से बाहर हुआ अमेरिका, लगाए ये गंभीर आरोप

Wed, 20 Jun 2018 09:49 AM IST
वर्ल्ड डेस्क, अमर अजाल
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अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) से अपना नाम वापिस ले लिया है। अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और संयुक्त राष्ट्र के लिए अमेरिका की दूत निकी हेली ने एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस बात की घोषणा की। हेली ने परिषद पर इजरायल के साथ राजनीतिक पक्षपात करने का आरोप लगाया।  

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हेली ने कहा कि परिषद उन देशों का बचाव करती है जो मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हैं। हेली ने वेनेजुएला, चीन, क्यूबा और ईरान का उदाहरण देते हुए कहा इस परिषद में कई ऐसे सदस्य मौजूद हैं जो मानवाधिकारों की इज्जत नहीं करते।

उन्होंने कहा कि परिषद दुनिया के उन्हीं देशों को बलि का बकरा बनाता है जिनका रिकॉर्ड मानवाधिकारों के मामले में बेहतर है। ऐसा परिषद इसलिए करता है ताकि अधिकारों को तोड़ने वाले देशों से दुनिया का ध्यान हटाया जा सके। हेली ने रूस, चीन, क्यूबा और मिस्त्र जैसे देशों पर आरोप लगाते हुए कहा अमेरिका ने परिषद में बहुत से सुधार करने की कोशिश की लेकिन ये देश इसमें अड़चनें लाते रहे और कोई सुधार नहीं होने दिया।

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ट्रंप के एक फैसले को परिषद ने बताया था गैरकानूनी

पिछले हफ्ते ऐसी भी खबरें आईं थीं कि अमेरिका ने परिषद में कुछ सुधारों की मांग की थी लेकिन उसकी उन मांगों को नहीं माना गया। तभी से इस बात के कयास लगाए जा रहे थे अमेरिका परिषद से अपना नाम वापिस ले लेगा। डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से ये अमेरिका का तीसरा बड़ा फैसला है जिसमें देश तीन बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठनों से किनारा कर चुका है। इससे पहले अमेरिका पेरिस क्लाइमेट चेंज सौदा और ईरान परमाणु सौदे से भी अलग होने का ऐलान कर चुका है। अमेरिका के इस फासले पर संयुक्त राष्ट्र के सचिव एंटोनियो गुटेरस के प्रवक्ता स्टीफन दुजारिक ने निराशा व्यक्त की है।

इससे पहले यूएनएचआरसी ने ट्रंप प्रशासन के उस फैसले का भी विरोध किया था जिसमें वह गैर कानूनी तरीके से मैक्सिको बॉर्डर पार करने वाले माता-पिता को उनके बच्चों से अलग कर रहा था। बता दें ट्रंप से पहले जॉर्ज बुश के कार्यकाल में भी अमेरिका ने तीन सालों के लिए परिषद की सदस्यता छोड़ दी थी। वहीं साल 2009 में ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका दोबारा इस परिषद में शामिल हो गया था।

बताते चलें कि यूएनएचआरसी का उद्देश्य दुनिया में मानवाधिकारों की रक्षा करना है। इसे 2006 में बनाया गया था। इससे पहले यह काम संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग देखता था। अमेरिका के इससे अलग हो जाने के बाद अब इसमें 46 सदस्य देश रह गए हैं। साल 2013 में परिषद को मानवाधिकार समूहों की आलोचना का सामना करना पड़ा था जब इसमें चीन, रूस, सऊदी अरब, अल्जीरिया और वियतनाम को शामिल किया गया था। वहीं अगर भारत की बात करें तो वह इस वक्त इस परिषद का सदस्य नहीं है लेकिन चार बार इसका सदस्य रह चुका है।
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