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'50 लाख बेरोजगार बढ़ेंगे' इस साल

Tue, 22 Jan 2013 11:42 PM IST
बीबीसी हिंदी
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संयुक्त राष्ट्र की मज़दूर के हालात पर काम करने वाली संस्था इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाईज़ेशन यानी आईएलओ ने चेतावनी देते हुए कहा है कि बीते साल 2012 में दुनियाभर में रह रहे बेरोजगारों की संख्या में 40 लाख़ से ज्य़ादा लोगों की बढ़त हुई है और अब ये संख्या बढ़कर 19 करोड़ सात लाख तक पहुंच गई है।
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आईएलओ ने ये जानकारी अपनी ताज़ा रिपोर्ट में दी है। इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि इसका असर सबसे ज़्यादा उन युवाओं पर पड़ा है जिनकी उम्र 24 वर्ष से कम है। दुनिया भर में रह रहे 24 साल से कम उम्र के युवाओं में से 13 प्रतिशत बेरोजगार हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस साल पूरी दुनिया में 50 लाख और नए लोग बेरोजगारी से त्रस्त होंगे और वर्ष 2014 में ऐसे लोगों के संख्या 30 लाख से ज्य़ादा हो सकती है।
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रिपोर्ट के अनुसार ये प्रवृत्ति अर्थव्यवस्था में आ रही गिरावट के बारे में बताती है। ये स्थिति तक़रीबन सभी विकसित देशों में पाई गई है।

बड़ा नुकसान
'ग्लोबल इंप्लॉयमेन्ट ट्रेंड 2013' के नाम से जारी की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2012 में पूरी दुनिया की छह प्रतिशत कामगारों की आबादी बेरोजगार थी।

इस रिपोर्ट में इस बात का भी विवारण दिया गया है कि लंबे समय तक के लिए या फिर हमेशा के लिए बेरोजगार हुए लोगों संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। सिर्फ यूरोप में ही वहां की एक-तिहाई आबादी पिछले एक साल से बेरोजगारी की मार झेल रही है।

इनमें से कई लोग ख़राब अर्थव्यवस्था के कारण हार मान चुके हैं और बाज़ार से पलायान कर रहे हैं। ऐसे लोगों की संख्या तीन करोड़ नौ लाख के आसपास है।

आईएलओ के डायरेक्टर जनरल गाइ राईडर के अनुसार, ''एक अनिश्चित अर्थव्यवस्था और ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए नीतिगत नाकामी ने कहीं ना कहीं बाज़ार में 'मांग' में कमी कर दी है। निवेशक अब वहां पैसा लगाने से बच रहे हैं।''

इस रिपोर्ट में रोज़गार पैदा करने वाली ट्रेनिंग में पैसा लगाने पर ज़ोर दिया गया है। जिससे युवाओं को नौकरी करने लायक बनाया जा सके।

राईडर के मुताबिक, ''ये एक तरह से युवा शक्ति और प्रतिभा का नाश करने जैसा है। इसका नुकसान ना सिर्फ इन लोगों को उठाना पड़ रहा है बल्कि ये समाज का भी नुकसान है।''

आईएलओ ने ख़ासतौर पर उन देशों के नाम लिए जहां अप्रेंटिसशिप की सुविधा बहाल रही और वहां के युवाओं में बेरोजगारी की समस्या सबसे कम देखी गई। ऐसे देशों में जर्मनी, ऑस्ट्रिया, स्विटज़रलैंड शामिल थे।
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