डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने शुक्रवार को घोषणा की कि वह तुर्की क पायलटों को एफ-35 लड़ाकू विमानों पर ट्रेनिंग देना बंद कर रहा है। केवल इतना ही नहीं उसने तुर्की से दो टूक कहा है कि यदि वह रूस से एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदता है तो उस स्थिति में वह उसे अपने विमान नहीं बेचेगा। भारत रूस के साथ एस-400 मिसाइल खरीदने वाले सौदे पर हस्ताक्षर कर चुका है। अमेरिका के इस फैसले का भारत पर भी असर पड़ने की संभावना है क्योंकि अमेरिकी प्रशासन इसपर अपना विरोध दर्ज कर चुका है।
पेंटागन ने 42 तुर्की पायलटों से 31 जुलाई तक अमेरिका से जाने के लिए कहा है। इन पायलटों को फ्लोरिडा और एरिजोना में पिछले कुछ महीनों से ट्रेनिंग दी जा रही है। तुर्की ने अमेरिका के साथ 100 एफ-35 लड़ाकू विमान खरीदने का समझौता किया है। पेंटागन का कहना है कि वह एफ-35 कार्यक्रम से संबंधित प्रबंधन और विनिर्माण गतिविधियों में तुर्की की भागीदारी को खत्म कर देगा।
अमेरिका के कार्यकारी रक्षा सचिव पैट्रिक शनाहन ने अपने तुर्की समकक्ष हुलूसी अकर को एक कड़ा पत्र लिखते हुए कहा, 'हम अपने मूल्यवान रिश्ते को बनाए रखना चाहते हैं। इसके बावजूद यदि वह एस-400 की डिलीवरी लेता है तो तुर्की को एफ-35 नहीं मिलेगा। आपके पास अभी भी एस-400 को लेकर अपना मन बदलने का विकल्प मौजूद है।'
अमेरिका ने इस तरह की चेतावनी भारत को भी दी है और उसका कहना है कि यदि वह रूस से एस-400 खरीदता है तो इसका असर भारत-अमेरिकी सामरिक रिश्तों पर पड़ सकता है। अमेरिका का तर्क है कि एस-400को एफ-35 की निकटता में लाने से रूस को विमान के रडार प्रोफाइल और संभावित कमजोरियों के बारे में पता चल जाएगा। एफ-35 अमेरिका के लड़ाकू विमान का एडवांस वर्जन है।
अमेरिका और तुर्की के रिश्तों में आई खटास का असर नई दिल्ली पर भी पड़ सकता है। भारत अमेरिका का महत्वपूर्ण साझेदार है। यह देखना होगा कि अमेरिका इंडो-पैसिफिक नीति के तहत चीन को काउंटर करने के लिए एस-400 पर भारत को कुछ छूट देता है या नहीं। अपने कड़े शब्दों से ट्रंप प्रशासन ने यह संकेत दिया है कि यदि उसके वाणिज्यिक और रणनीतिक हित प्रभावित होते हैं तो वह तुर्की को नाटो सहयोगी के तौर पर बाहर करने से भी नहीं हिचकिचाएगा।