जर्मनी में चुनाव के गरमाते माहौल के बीच मास्क घोटाले के हुए खुलासे से चांसलर अंगेला मैर्केल के लिए नई मुसीबत खड़ी हो गई है। इस घोटाले में आरोप है कि मैर्केल की पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) के एक और उनके सहयोग दल- क्रिश्चियन सोशल यूनियन के एक सांसद ने मास्क सौदों में दलाली खाई। जर्मनी में पहले ही कोरोना वायरस संक्रमण के टीकाकरण की धीमी गति को लेकर विवाद चल रहा है। अब मास्क घोटाले के खुलासे के बाद सत्ताधारी पार्टी को बचाव का रुख अपनाना पड़ रहा है। ताजा जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक हालिया विवादों के कारण सत्ताधारी पार्टी की लोकप्रियता में गिरावट आई है।
मास्क घोटाले में सांसद निकोलस लोबेल ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपनी फेस मास्क बनाने वाली कंपनी को ठेका दिलवाने में भूमिका निभाई। दूसरे सांसद क्रिश्चियन सोशल यूनियन पी जॉर्ज नुब्लीन हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने एक मास्क निर्माता कंपनी को सरकारी ठेका दिलवाने के बदले छह लाख साठ हजार यूरो की रिश्वत ली। इस विवाद को लेकर दोनों सांसदों को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा है।
जर्मनी में इस साल चुनाव होने वाले हैं। इसकी शुरुआत अगले रविवार को दो प्रांतों बाडेन-वुर्तेमबर्ग और राइनलैंड-पलातीनेट में मतदान के साथ होगी। सितंबर में आम चुनाव होगा, जिसमें जर्मनी के लोग मैर्केल का उत्तराधिकारी चुनेंगे। बाडेन-वुर्तेमबर्ग जर्मनी के सबसे धनी राज्यों में एक है। यहां बड़ी कार कंपनियों के मुख्यालय हैं। पारंपरिक रूप से यह कंजरवेटिव राज्य रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में यहां ग्रीन पार्टी का असर बढ़ा है। अभी भी वहां ग्रीन पार्टी की सरकार है। अब घोटाले के ताजा खुलासे के बाद मैर्केल की पार्टी की इस उम्मीद को तगड़ा झटका लगा है कि इस बार वह ग्रीन पार्टी से राज्य को छीन लेगी।
विश्लेषकों का कहना है कि अगर ग्रीन पार्टी अपनी जीत दोहराने में सफल रही, तो उससे राष्ट्रीय स्तर पर उसका मनोबल बढ़ेगा। वह सितंबर के चुनावों में भी मैर्केल की पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरने की स्थिति में आ जाएगी। चुनाव पूर्व जनमत संग्रहों के एक औसत के मुताबिक ग्रीन पार्टी को 33 फीसदी वोट मिलने का अनुमान है। इस तरह उसे सीडीयू पर आठ फीसदी वोटों की बढ़त दिख रही है।
ताजा संकेतों के मुताबिक सीडीयू की संभावनाएं राइनलैंड-पलातीनेट राज्य में अपेक्षाकृत बेहतर हैं। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के मुताबिक मुमकिन है कि यहां सीडीयू के पहले नंबर पर रहे। हालांकि यहां भी उसे सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी से कड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है। फिलहाल यहां सोशल डेमोक्रेट्स सत्ता में है और राज्य के प्रधानमंत्री मालू द्रेयर की लोकप्रियता कायम है। सर्वेक्षणों के औसत के मुताबिक सोशल डेमोक्रेट्स को फिलहाल 31 फीसदी और सीडीयू को 30 फीसदी वोट मिलते दिख रहे हैं। लेकिन ये संभव है कि मतदान के दिन तक इस सूरत में बदलाव आए।
जानकारों का कहना है कि राइनलैंड-पलातीनेट एक छोटा राज्य है। इसके बावजूद यहां के नतीजे का प्रतीकात्मक महत्व होगा। अगर मैर्केल की पार्टी यहां भी जीतने में नाकाम रही, तो राष्ट्रीय चुनावों के लिए उसकी संभावनाओं पर खराब असर हो सकता है। यहां के नतीजे की अहमियत इसलिए भी है कि यह पूर्व चांसलर हेल्मुट कोल का गृह राज्य है। कोल सीडीयू के नेता थे और उनकी देखरेख में ही पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी का एकीकरण हुआ था। इसलिए उनकी काफी प्रतिष्ठा रही है। ये राज्य लंबे समय तक सीडीयू का गढ़ रहा, लेकिन अब हालात बदल गए हैं। इसका असर चुनाव नतीजों पर दिखता रहा है।