बच्चों को सोशल मीडिया के नुकसान से बचाने के लिए सिर्फ उम्र और स्क्रीन टाइम की सीमा तय करना काफी नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि असली समस्या उन एल्गोरिदम की है, जो बच्चों को बार-बार एक खास तरह का कंटेंट दिखाते हैं। पढ़िए रिपोर्ट
बच्चों को सोशल मीडिया के संभावित नुकसान से बचाने के लिए इस्तेमाल की उम्र व समय सीमा तय करना पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती यह है कि प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम बच्चों को किस तरह का कंटेंट बार-बार दिखा रहे हैं और उन्हें उसी ओर क्यों खींच रहे हैं। मेटा की नई पाबंदियों के बाद विशेषज्ञों ने इसी पहलू पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि केवल स्क्रीन टाइम घटाने से बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया के प्रभाव को खत्म नहीं किया जा सकता।
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बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया के असर को लेकर चल रहे कानूनी विवाद के बीच मेटा ने अमेरिकी राज्यों के साथ समझौता किया है। कंपनी 18 अरब डॉलर तक का भुगतान करेगी। साथ ही अमेरिका में 18 साल से कम उम्र के फेसबुक और इंस्टाग्राम उपयोगकर्ताओं के लिए रोजाना अधिकतम दो घंटे इस्तेमाल की सीमा और रात 12 बजे से सुबह 6 बजे तक रोक लागू की जाएगी। नेचर की रिपोर्ट के अनुसार यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया की मनोवैज्ञानिक कैथरीन मोडकी के अनुसार बच्चों की सुरक्षा का केंद्र उन एल्गोरिदम पर होना चाहिए जो तय करते हैं कि उन्हें कौन-सा कंटेंट बार-बार दिखेगा। समझौते के तहत मेटा 18 साल से कम उम्र के उपयोगकर्ताओं को लक्षित कंटेंट एल्गोरिदम बंद करने का विकल्प देगा, लेकिन डिफॉल्ट सेटिंग में एल्गोरिदम चालू रहेंगे।
उम्र की पाबंदी भी हो रही बेअसर
ऑस्ट्रेलिया ने पिछले दिसंबर में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाई थी। इसके तीन महीने बाद करीब 900 अभिभावकों के सर्वे में लगभग 70 प्रतिशत ने बताया कि उनके बच्चे का अब भी किसी प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अकाउंट था। मिनेसोटा विश्वविद्यालय के आंकड़ों में करीब एक-तिहाई बच्चों ने सोशल मीडिया पर अपनी उम्र गलत दर्ज करने की बात कही। विशेषज्ञों के मुताबिक किशोर उम्र सत्यापन को चकमा देने के तरीके खोज सकते हैं और मेटा पर पाबंदी से वे दूसरे प्लेटफॉर्म की ओर जा सकते हैं।
ब्यूटी फिल्टर पर रोक का असर भी सीमित
मेटा किशोरों के लिए चेहरे और रूप-रंग में अत्यधिक बदलाव करने वाले कुछ ब्यूटी फिल्टर पर भी रोक लगाएगा। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक बच्चे ऐसे फिल्टर केवल खुद इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि दूसरे लोगों का कंटेंट भी देखते हैं। इसलिए फिल्टर हटाने से शरीर और रूप-रंग को लेकर सोशल मीडिया के दबाव का असर खत्म नहीं होगा।
मूल सवाल कारोबारी मॉडल का सबसे बड़ी समस्या सोशल मीडिया के उस कारोबारी मॉडल में है, जिसमें कंपनियों का राजस्व उपयोगकर्ताओं का समय और एंगेजमेंट बढ़ाने से जुड़ा है। ज्यादा एंगेजमेंट का मतलब अधिक विज्ञापन और कमाई है। इसीलिए वे स्वतंत्र सुरक्षा जांच, एल्गोरिदम में पारदर्शिता और बच्चों के लिए सुरक्षित सेटिंग को डिफॉल्ट बनाने की मांग कर रहे हैं।