अमेरिका के ड्रोन हमले में अयमान अल-जवाहिरी के मारे जाने के बाद आतंकवादी संगठन अल-कायदा के भविष्य को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। अल-जवाहिरी सितंबर 2011 में अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमलों के मुख्य षड्यंत्रकारियों में गिना जाता था। अल-कायदा के भीतर उसका दर्जा मारे गए आतंकवादी ओसामा बिन-लादेन के बाद दूसरा था। 2011 में पाकिस्तान के एबटाबाद में अमेरिकी कार्रवाई में ओसामा के मारे जाने के बाद अल-जवाहिरी अल-कायदा का नेता बना था।
बीते सोमवार को एक टीवी प्रसारण में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने अल-जवाहिरी के मारे जाने का एलान किया। अमेरिका के अफगानिस्तान से लौटने के लगभग एक वर्ष बाद अमेरिका को ये कामयाबी मिली। उसके बाद से विशेषज्ञों के बीच ये सवाल चर्चित है कि क्या इसके साथ अल-कायदा खत्म हो जाएगा।
अमेरिका के वेस्ट प्वाइंट स्थित यूएस मिलिटरी एकेडमी से जुड़े आतंकवाद विशेषज्ञ डैनियल मिल्टन ने राय जताई है कि अब अल-कायदा एक दोराहे पर पहुंच गया है। अब सवाल यह है कि अल-कायदा का नया नेता कौन बनेगा। अगर ये संगठन ऐसे नेता ढूंढने में सफल रहा, जो संगठन से जुड़े समूहों का समूहों का भरोसा पा सके, तो अल-कायदा इस झटके से उबर सकता है। वरना, नए नेता को चुनौतियां मिलेंगी, जिससे इस संगठन में बंटवारे की संभावना बनेगी। अमेरिका की जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में आतंकवाद विभाग में अनुसंधानकर्ता होरोरो जे इनग्राम और एंड्र्यू माइन्स भी इस राय से सहमत हैं।
विशेषज्ञों की राय है कि अल-कायदा की अभी भी दुनिया के कई हिस्सों में मौजूदगी है। इसलिए यह संभव है कि जैसे ओसामा बिन-लादेन की मौत के बाद भी संगठन सक्रिय रहा, वैसा ही अल-जवाहिरी की मौत के बाद भी हो सकता है। अफगानिस्तान में शासन कर रहे तालिबान को अल-कायदा का निकट सहयोगी समझा जाता है। पिछले साल तालिबान के सत्ता में आने को अल-कायदा की भी एक कामयाबी माना गया था।
जानकारों के मुताबिक अल-कायदा के पांव अभी अफ्रीका के माली से लेकर चैड और सोमालिया तक फैले हुए हैं। इसके अलावा यमन में भी उसकी शाखा है। संयुक्त राष्ट्र की निगरानी टीम की एक रिपोर्ट के मुताबिक अल-कायदा अभी भी अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को निशाना बनाने में सक्षम है। लेकिन इसकी ताकत कितनी बनी रहेगी, यह इस पर निर्भर करेगा कि क्या संगठन अपना एक सर्वमान्य नेता ढूंढ पाता है।
अल-कायदा का गठन 1988 में हुआ था। उसके बाद से इस संगठन के दो ही नेता रहे हैं। अब चर्चा है कि सैफ अल-अदेल इसका तीसरा नेता बन सकता है। वह मिस्र की सेना में कर्नल रह चुका है। 1988 में तंजानिया और केन्या में अमेरिकी दूतावासों पर हुए आतंकवादी हमलों का मुख्य षड्यंत्रकारी उसे ही माना जाता है। लेकिन उसकी उम्र को देखते हुए ये सवाल बना हुआ है कि अब अल-कायदा के प्रमुख के रूप में वह कितना प्रभावशाली साबित होगा।
अल-जवाहिरी पर हुए ड्रोन हमले की तालिबान ने कड़ी आलोचना की है। उसने कहा है कि ये हमला कर अमेरिका ने दोहा वार्ता के दौरान बनी सहमति का उल्लंघन किया है। समझा जाता है कि इस हमले के बाद तालिबान से अमेरिका के संबंध और खराब हो सकते हैं।