प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बाद भी अफ्रीकी देशों की गिनती दुनिया के सर्वाधिक पिछड़े राष्ट्रों में की जाती है। भारत और चीन दोनों ऐसे देश हैं जिनके अफ्रीका में अपने कारोबारी हित हैं और दोनों देशों का बीच कुल व्यापार 250 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच चुका है। वहीं अफ्रीका दुनिया का ऐसा क्षेत्र है, जहां बड़ी तेजी से शहरीकरण हो रहा है। यहां बड़ी तेजी से गांवों से शहरों की तरफ पलायन हो रहा है।
आबादी 110 करोड़ से बढ़ कर दोगुनी
मैकिंसे की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2050 तक अफ्रीका की आबादी 110 करोड़ से बढ़ कर दोगुनी हो जाएगी। वहीं सबसे ज्यादा 80 फीसदी तकरीबन आबादी शहरी क्षेत्रों में होगी। अकेले लागोस में ही जनसंख्या 77 व्यक्ति प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ रही है। अनुमान के मुताबिक 2025 तक ही अफ्रीका के कम से कम 100 ऐसे शहर होंगे, जिनकी आबादी 10 लाख से ज्यादा होगी।
चीन सबसे बड़ा निवेशक
अफ्रीका महाद्वीप में 54 देश हैं, जिनके शहरीकरण में सबसे बड़ी भूमिका चीन की है। अफ्रीका का इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने में चीन अहम भूमिका निभा रहा है। वहां के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स डेवलप करने में चीन सबसे बड़ा निवेशक है। इनमें से कई प्रोजेकेट्स को यहा तो चीनी कंपनियां बना रही हैं, या फिर चीन की तरफ से फंडिंग हो रही है। अफ्रीकी देश चीन को कच्चे माल और खनिज का निर्यात करते हैं। इनमें से कई अफ्रीकी देश अपना ज्यादातर कारोबार चीन के साथ कर रहे हैं।
तीन मंजिला ईमारत का ठेका भी चीन के पास
अफ्रीकी देशों में चीन के बारे में तो यह भी कहा जाने लगा है कि अगर इन शहरों में तीन मंजिला ऊंची ईमारत या तीन किमी से लंबी सड़क बन रही है, तो जरूर चीन की कोई कंपनी बना रही होगी। यहां तक कि 2013 में चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव परियोजना के आधिकारिक एलान से पहले भी चीन वहां के शहरों की विकास की ज्यादातर परियोजनाओं से जुड़ा हुआ था।
अफ्रीका में 10 हजार से ज्यादा चीनी कंपनियां
मैकिंसे की रिपोर्ट बताती है कि साइनो-अफ्रीकन के बीच हर साल तकरीबन बीस हजार करोड़ करोड़ डॉलर का व्यापार हो रहा है। पूरे अफ्रीका महाद्वीप में इस समय कम से कम 10 हजार से ज्यादा कंपनियां सक्रिय हैं और 2005 से अभी तक चीनी कंपनियां वहां दो ट्रीलियन डॉलर से ज्यादा का निवेश कर चुकी हैं, जबकि 30 हजार का निवेश अभी वहां होना बाकी है, जिस पर बातचीत चल रही है। वहीं हाल ही में बीजिंग ने एलान किया है बेल्ट एंड रोड इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के लिए 100 करोड़ डॉलर का निवेश करेगा। असल में चीन अफ्रीका में अपनी इस परियोजना के विस्तार को लेकर चिंतित है।
कर्ज से प्राकृतिक संसाधनों पर नजर
चीन अपनी निवेश की इस रणनीति से दो निशाने साथ रहा है, जिसमें चीन का पहला फायदा यह होगा कि अफ्रीकी देश चीन के कर्ज के जाल में फसेंगे, वहीं दूसरा फायदा यह है कि वहां के प्राकृतिक संसाधनों पर चीन का कब्जा होगा। अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सोने का ही सर्वाधिक उत्पादन दक्षिण अफ्रीका के जोहांसबर्ग में होता है। वहीं दक्षिण अफ्रीका में सस्ती मजदूरी का फायदा भी चीन उठा रहा है।
दो-तिहाई अफ्रीका चीन के चंगुल में
इसके अलावा एक सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि चीन पैसे और तकनीक के बल पर गरीब अफ्रीकी देशों को कर्ज के जंजाल में फंसा कर अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहा है। पिछले साल चीन ने 4,200 करोड़ रुपये की बिना ब्याज की ‘मदद’ की। इस साल आईएमएफ यानी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और वर्ल्ड बैंक ने भी दुनियाभर की सरकारों से कर्ज के इस ‘खेल’ में पारदर्शिता बरतने के लिए कहा। 2012 में आईएमएफ ने पाया कि 15 फीसदी अफ्रीका चीन के कर्ज वाले जाल में फंसा हुआ है और अगले कुछ सालों में यह दो-तिहाई हिस्से तक पहुंच जाएगा।
कर्ज के जाल में फंसे कई देश
इससे पहले सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलेपमेंट रिसर्च ने एक रिपोर्ट कर बताया था कि चीन से कर्ज लेने वाले दुनिया के आठ देशों की अर्थव्यवस्था चौपट हो सकती है, जिनमें तजाकिस्तान, जिबूती, मोंटेनेग्रो, मंगोलिया, लाओस, मालदीव और पाकिस्तान शामिल हैं। वहीं कर्ज का चुका पाने की स्थिति में चीन इन देशों पर तमाम तरह के दबाव बना कर कई समझौते करने के लिए मजबूर करता है।
हंबनटोटा बंदरगाह से लें सबक
श्री लंका का हंबनटोटा बंदरगाह इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है। श्रीलंका ने हंबनटोटा पोर्ट और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित करने के लिए चीन से आठ अरब डॉलर का कर्ज लिया था, लेकिन ये प्रोजेक्ट फेल हो गया, इसकी वजह थी कि दुनिया के सबसे बिजी शिपिंग लेन्स में से हर साल हजारों जहाज निकलते हैं, वहीं हंबनटोटा से 2012 में सिर्फ 34 जहाज ही निकले और उसके बाद इस पोर्ट पर चीन का कब्जा हो गया।