मुत्ताकी को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 25 जनवरी, 2001 को प्रतिबंधित व्यक्तियों की सूची में शामिल किया था और उन पर यात्रा प्रतिबंध, संपत्ति पर रोक और हथियारों के आयात पर पाबंदी लगा दी गई थी।
अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री मावलवी आमिर खान मुत्ताकी अगले हफ्ते भारत दौरे पर आएंगे। मुत्ताकी की यह यात्रा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की तालिबान प्रतिबंध समिति की ओर से यात्रा प्रतिबंध हटाने की मंजूरी मिलने के बाद हो रही है।
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मुत्ताकी को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 25 जनवरी, 2001 को प्रतिबंधित व्यक्तियों की सूची में शामिल किया था और उन पर यात्रा प्रतिबंध, संपत्ति पर रोक और हथियारों के आयात पर पाबंदी लगा दी गई थी। प्रतिबंध समिति की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार, सुरक्षा परिषद समिति ने 30 सितंबर को मावलवी अमीर खान मुत्ताकी को 9 से 16 अक्तूबर के बीच भारत की राजधानी नई दिल्ली जाने के लिए यात्रा प्रतिबंध से छूट देने को मंजूरी दे दी। यह अगस्त 2021 में अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद काबुल से भारत का पहला मंत्रिस्तरीय दौरा होगा। यूएन ने कहा कि मुत्ताकी को तालिबान का एक प्रमुख सदस्य माना जाता है और तालिबान शासन के दौरान वह संयुक्त राष्ट्र की अगुवाई वाली वार्ता में तालिबान का प्रतिनिधि भी रह चुके हैं। समिति संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी 15 सदस्यों से बनी है और यह सर्वसम्मति से निर्णय लेती है। 1988 की तालिबान प्रतिबंध समिति की अध्यक्षता वर्तमान में पाकिस्तान के पास है। 2025 के लिए दो उपाध्यक्ष गुयाना और रूस हैं।
कुछ दिनों पहले केंद्र सरकार के उच्चस्थ सूत्रों ने बताया है कि मुत्ताकी के दौरे को लेकर भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से संपर्क किया था क्योंकि वह यूएनएससी की प्रतिबंधित सूची में है। ऐसे में उन्हें यात्रा करने के लिए इजाजत की जरूरत थी। दोनों देशों के बीच बढ़ते संपर्क के मद्देनजर विदेश मंत्री एस जयशंकर और मुत्ताकी के बीच बीती 15 मई को फोन पर बात हुई थी। जयशंकर ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा था कि उनकी मुत्ताकी के साथ अच्छी बातचीत हुई और उन्होंने पहलगाम आतंकी हमले की निंदा करने के लिए उनकी सराहना की। हमने अफगान लोगों के साथ अपनी पारंपरिक दोस्ती और उनकी विकास संबंधी जरूरतों में लगातार सहयोग देने पर जोर दिया। सहयोग को आगे बढ़ाने के तरीकों पर भी चर्चा की। हालांकि भारत ने अभी तक तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है और वह काबुल में एक वास्तविक समावेशी सरकार के गठन की वकालत करता रहा है।