अमेरिका में सरकारी कर्ज में अभूतपूर्व बढ़ोतरी के बाद अर्थशास्त्रियों के बीच इसके संभावित परिणामों को लेकर बहस छिड़ गई है। इस हफ्ते जारी आंकड़ों के मुताबिक अमेरिकी सरकार पर कुल कर्ज 30 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा हो गया है। यह अमेरिका के सालाना जीडीपी के लगभग 125 फीसदी के बराबर है। कोरोना काल में अमेरिका सरकार ने बड़ी मात्रा में कर्ज लिया। नतीजा यह है कि 2019 के बाद उस पर मौजूद कर्ज में सात ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा बढ़ोतरी हो गई है।
राजकोषीय स्थिति का अध्ययन करने वाली संस्था पीटर जी. पीटरसन फाउंडेशन के मुताबिक अगले दस साल में सिर्फ ब्याज के रूप में अमेरिका सरकार को पांच ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की रकम चुकानी होगी। 2051 तक तो अमेरिका सरकार को अपने सालाना राजस्व का लगभग आधा हिस्सा ब्याज चुकाने के लिए खर्च कर देना होगा। डेविड केली ने कहा है कि कर्ज चुकाने पर अधिक रकम खर्च करने की वजह से जलवायु परिवर्तन रोकने से जुड़ी और ऐसी अन्य योजनाओं पर खर्च करने की अमेरिका सरकार की क्षमता सीमित हो जाएगी।
ताजा आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका की संघीय सरकार पर अभी अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का आठ ट्रिलियन डॉलर का कर्ज है। इनमें सबसे ज्यादा निवेशक जापान और चीन के हैं। केली ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘इस कर्ज को अंततः चुकाना होगा। इसका अर्थ यह हुआ कि अमेरिकी करदाता चीन और जापान के लोगों की रिटायरमेंट सुविधाओं का बोझ उठाएंगे, जो हमारे कर्जदाता हैं।’
वैसे कुछ अर्थशास्त्रियों ने ध्यान दिलाया है कि 30 ट्रिलियन डॉलर एक भ्रामक आंकड़ा है, क्योंकि इसका एक हिस्सा खुद अमेरिकी सरकार का ही है। यह कर्ज सामाजिक सुरक्षा और अन्य सरकारी ट्रस्ट फंड्स से लिया गया है। अपनी ही एजेंसियों से लिए गए कर्ज की कुल रकम लगभग छह ट्रिलियन डॉलर है। लेकिन ये अर्थशास्त्री भी मानते हैं कि सरकार पर कर्ज का बोझ अत्यधिक हो गया है। इसमें खास कर 2008 की आर्थिक मंदी और 2020 में आई कोरोना महामारी के कारण तेजी से उछाल आया।