टेक्नोलॉजी की जो वैश्विक व्यवस्था 1990 के दशक में वजूद में आई थी, यूक्रेन संकट के बीच वह दरकती दिख रही है। पश्चिमी देशों और रूस बीच टकराव बढ़ने के साथ ही इस व्यवस्था के भविष्य पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। जानकारों का कहना है कि 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद बनी स्थितियों में इंटरनेट का दुनिया भर में तेजी से प्रसार हुआ। तब अमेरिकी कंपनियों ने सारी दुनिया को अपने बाजार के रूप में देखना शुरू किया। उससे उन कंपनियों के धन और ताकत में इतना इजाफा हुआ, जिसकी पहले कल्पना भी नहीं की जाती थी।
विशेषज्ञों के मुताबिक अब टेक्नोलॉजी की दुनिया भी दो खेमों में बंटती दिख रही है। अमेरिका और चीन के बीच अलगाव पहले से हो रहा था। यूक्रेन पर हमले के बाद अब रूस भी अमेरिकी नेतृत्व वाली वैश्विक टेक्नोलॉजी व्यवस्था से अलग-थलग हो गया है। इससे पश्चिमी कंपनियों के मुनाफे पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है।
लेकिन चीन के उदय से चिंतित अमेरिका ने 2017 के बाद से चीन के खिलाफ प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए। उसकी प्रतिक्रिया में चीन ने तकनीक के क्षेत्र में अपनी ताकत दिखानी शुरू कर दी। अब यूक्रेन के हमले के बाद कई देश इस भय से चीनी तकनीक को अपनाने की इच्छा दिखा रहे हैं कि अमेरिकी कंपनियां कभी उन्हें भी अपने प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंधित कर सकती हैँ। लैटिन अमेरिकी देश वेनजुएला ने तो सोशल मीडिया के अपने प्लेटफॉर्म लॉन्च करने का एलान कर दिया है। चीन के पास पहले से ऐसे प्लेटफॉर्म हैं। समझा जाता है कि अब दुनिया के कई हिस्सों में चीनी सोशल मीडिया मंचों का इस्तेमाल बढ़ सकता है।
एक्सियोस.कॉम के विश्लेषक स्कॉट रोजेनबर्ग ने लिखा है कि इस घटनाक्रम का नतीजा यह होगा कि टेक्नोलॉजी का वैश्विक बाजार बंट जाएगा। सबसे दूरगामी असर की घटना इंटरनेट का बंटवारा होगी। अब ऐसे कई इंटरनेट अस्तित्व में आ सकते हैं, जिनकी पहुंच का दायरा किसी एक क्षेत्र तक ही सीमित होगा। इससे पिछले तीन दशक में जो हासिल हुआ था, वह खो जाएगा।