अजरबैजान की राजधानी बाकू में कॉप 29 के लिए लोगो
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भारत ने कहा कि उसने सम्मेलन में नए पैकेज को अंगीकार किए जाने से पहले बोलने का मौका देने का आग्रह किया था, जिसे नजरअंदाज किया गया। रैना ने कहा, हमने अध्यक्ष व उसके सचिवालय को सूचित किया था कि हम पैकेज को अंगीकार करने के किसी भी निर्णय से पहले अपनी बात रखना चाहते हैं। हालांकि, यह सभी जानते हैं कि सबकुछ पहले से प्रबंधित था। हम इस घटनाक्रम से बहुत निराश हैं।
विकसित देश ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार, इसलिए चाहिए वित्तीय मदद
भारतीय आरि्थक सलाहकार रैना ने कहा, विकसित देश ऐतिहासिक रूप से जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार रहे हैं। उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे विकासशील व निम्न आय वाली अर्थव्यवस्थाओं को वित्त, प्रौद्योगिकी तथा क्षमता निर्माण सहायता प्रदान करें, ताकि उन्हें गर्म होती दुनिया से निपटने में मदद मिल सके। उन्होंने 2009 में 100 अरब डॉलर के पैकेज का एलान किया था। वर्ष 2020 तक पैकेज के सिर्फ 70 प्रतिशत लक्ष्य को ही हासिल किया सका और वह भी कर्ज की शक्ल में। 300 अरब डॉलर से विकासशील देशों का कुछ नहीं होने वाला। भारत की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद अब विकसित देशों पर जलवायु वित्त को बढ़ाने का दबाव बढ़ गया है।
प्रभावित देशों को ही उपायों के लिए किया जा रहा मजबूर
भारतीय प्रतिनिधि ने कहा, विकासशील देश जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित हैं और उन्हें ही कम कार्बन वाले रास्ते अपनाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। विकिसशील देशों पर इसके जरिये उनके विकास को खतरे में डालने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। उन्हें विकसित देशों के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (सीबीएएम) जैसे एकतरफा उपायों का भी सामना करना पड़ रहा है। मौजूदा पैकेज विकासशील देशों की जलवायु परिवर्तन को अपनाने की क्षमता को प्रभावित करेगा। इससे उनका विकास गहरे तौर पर प्रभावित होगा।
कॉप-29 में पैसे बनाने पर फोकस
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अल्प विकसित देशों ने भी बताया निराशाजनक
संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में वैश्विक दक्षिण के लिए 300 अरब डॉलर के नए जलवायु वित्त पैकेज पर भले ही सहमति बन गई हो, लेकिन बड़ी संख्या में देशों की प्रतिक्रियाओं से पता चलता है कि इससे हर कोई खुश नहीं है। अल्प विकसित देशों (एलडीसी) समूह के अध्यक्ष इवांस नेजेवा ने इसे निराशाजनक बताया। जेनेवा ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, हमने जलवायु संकट से सबसे कमजोर लोगों को बचाने व अपने ग्रह को स्वस्थ बनाने का मौका खो दिया। नए जलवायु वित्त लक्ष्य को लेकर गंभीर चिंताएं बनी हुई हैं। हमारे साथ खड़े होने वाले सभी लोगों का धन्यवाद। हम लड़ते रहेंगे।
पूर्व यूएन अधिकारी ने सम्मेलन को बताया विफल संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार की पूर्व उच्चायुक्त मैरी रॉबिंसन ने कहा कि यूएन जलवायु सम्मेलन लगभग विफल रहा। यह एक निराशाजनक समझौते के साथ समाप्त हुआ। यूनियन ऑफ कंसंर्ड साइंटिस्ट्स की नीति निदेशक रेचल क्लीटस ने जलवायु वित्त वार्ता के अजरबैजानी अध्यक्षता की आलोचना की।
अपने उद्देश्यों को पाने में विफल रहा कॉप : अरुणाभ
काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायनरमेंट एंड वॉटर के सीईओ व वरिष्ठ पर्यावरणविद अरुणाभ घोष ने कहा कि कॉप29 अपने मूल उद्देश्यों पर खरा उतरने में विफल रहा,। वास्तविक वित्तीय सहायता पर फैसले की जगह हमने खोखले वादों का दोहराव देखा। विकसित देश अपने वादे के मुताबिक कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने में विफल रहे हैं। इसके बावजूद वे वैश्विक दक्षिण पर बोझ डालने में भी लगे रहते हैं।