जी-7 देशों के शिखर सम्मेलन से ठीक पहले जारी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि बड़ी कंपनियां जलवायु परिवर्तन संबंधी लक्ष्यों के साथ कैसे धोखा कर रही हैं। गौरतलब है कि जी-7 शिखर सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन पर भी चर्चा का एक प्रमुख मुद्दा रहेगा। नई रिपोर्ट फ्रेंड्स ऑफ अर्थ इंटरनेशनल और ग्लोबल फॉरेस्ट कोलिशन नाम के गैर सरकारी संगठनों ने जारी की है। इसका नाम ‘द बिग कॉन’ यानी बड़े धोखेबाज रखा गया है।
रिपोर्ट में आरोप लगाया है कि शेल, माइक्रोसॉफ्ट और नेसले जैसी कंपनियां ऐसे ‘नेट जीरो’ (शून्य उत्सर्जन) प्रावधानों के लिए लॉबिंग में जुटी हुई हैं, जिनसे असल में उन्हें कार्बन के उत्सर्जन में कोई कटौती नहीं करनी पड़ेगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि ये कंपनियां ऐसे तौर-तरीकों का सहारा ले रही हैं, जिनसे ऐसी धारणा बनती है कि वे उत्सर्जन घटा रही हैं, जबकि असल में वैसा नहीं हो रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक इन कंपनियों ने कार्बन ऑफसेट जैसे तरीकों की वकालत की है। रिपोर्ट में बताया गया है कि 2030 तक के लिए शेल कंपनी उतने बड़े पैमाने पर कार्बन ऑफसेट खरीदने की तैयारी में है, जितना 2019 तक विश्व बाजार में उपलब्ध ही नहीं था। कार्बन ऑफसेट का मतलब उतनी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन का अधिकार हासिल कर लेना है, जितना कोई कंपनी किसी और जगह कार्बन उत्सर्जन की मात्रा घटाने के लिए काम कर रही हो।
रिपोर्ट के मुताबिक यूनाइटेड एयरलाइस ने कार्बन ऑफसेट के तौर पर कार्बन डायरेक्ट एयर कैप्चर प्लांट लगाने की योजना पेश की है। बताया जाता है कि ऐसे प्लांट वातावरण में मौजूद कार्बन को बेअसर कर देते हैँ। द बिग कॉन रिपोर्ट में वॉलमार्ट कंपनी पर उन चीजों के उत्पादन से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को नजरअंदाज करने का इल्जाम लगाया गया है, जिनकी बिक्री वह करती है। बताया गया है कि वॉलमार्ट जितना कार्बन उत्सर्जन करती है, उनमें 95 फीसदी हिस्सा ऐसे ही उत्पादों का है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बड़े पैमाने पर प्रदूषण फैलाने वाली कंपनियां ढांचागत बदलावों से इनकार कर रही हैं। वे दुनिया के आवाम और धरती के भविष्य पर अपने मुनाफे को तरजीह दे रही हैं। रिपोर्ट में आरोप लगाया है कि इन प्रदूषक कंपनियों और सरकारों के बीच साठगांठ है। इसलिए सरकारें प्रदूषण के खतरों को नजरअंदाज कर इन कंपनियों की मर्जी के मुताबिक नियम बना देती हैँ।
रिपोर्ट में ध्यान दिलाया गया है कि इंटरनेशनल एमिशन ट्रेडिंग एसोसिएशन (आईईटीए) नाम की संस्था कंपनियों की तरफ से लॉबिंग करने वाला सबसे प्रमुख संगठन है। इस संगठन की स्थापना बड़ी तेल कंपनियों शेल, बीपी और शेवरॉन ने की थी। गैर सरकारी संगठन ग्लोबल फॉरेस्ट कोलिशन के कार्यकर्ता कोरैना डी ला प्लाजा ने टीवी चैनल यूरो न्यूज से कहा- ‘जलवायु नीतियों पर जिस तरह कॉरपोरेट सेक्टर ने कब्जा जमा लिया है और जिस तरह सरकारों के साथ उनकी साठगांठ बढ़ी है, उससे हम चिंतित हैँ। इसी वजह से नेट जीरो जैसे फर्जी समाधानों को आगे बढ़ा जा रहा है।’
फ्रेंड्स ऑफ अर्थ की कार्यकर्ता सारा शॉ ने कहा कि बड़े प्रदूषकों ने नेट जीरो की जो योजनाएं पेश की हैं, वे एक बड़े धोखे के अलावा और कुछ नहीं है। ये कंपनियां पहले की तरह ही काम करते रहना चाहती हैं। लोगों को इसको लेकर अब जागरूक होना पड़ेगा कि वे इन कंपनियों के धोखे का शिकार हो गए हैं।