आतंकवाद और चरमपंथ से लड़ने के लिए क्या किया?
आतंकी हमलों के बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने दुनिया भर में आतंकवादियों के खिलाफ अभियान शुरू करने का एलान किया। इसे ‘ग्लोबल वॉर ऑन टेरर’ (GWOT) कहा गया। इसमें सैन्य कार्रवाई के साथ आतंकियों की आर्थिक मदद रोकना शामिल था। इसके साथ ही उन्हें सुरक्षित ठिकाने मिलने से रोकना भी शामिल था। कई देशों ने इस अभियान में अमेरिका का साथ दिया।
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20 सितंबर 2001 को बुश ने तालिबान से अल-कायदा के सदस्यों को पनाह देना बंद करने को कहा। इसके बाद 24 सितंबर को आतंकवादी संगठनों और उन्हें आर्थिक मदद देने वालों की संपत्तियां फ्रीज करने का आदेश दिया गया।
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7 अक्तूबर 2001 को अमेरिका ने अफगानिस्तान में सैन्य कार्रवाई शुरू की। शुरुआती हमलों में अल-कायदा के प्रशिक्षण शिविरों और तालिबान के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। इसके साथ अफगानिस्तान के लोगों को मानवीय मदद भी देने की बात कही गई।
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इसके बाद अमेरिका ने इराक पर भी दबाव बढ़ाया। अमेरिका ने सद्दाम हुसैन की सरकार पर आतंकवाद से संबंध और बड़े पैमाने पर विनाशकारी हथियार रखने जैसे आरोप लगाए। 19 मार्च 2003 को अमेरिका ने इराक में सैन्य अभियान शुरू किया, जिसका मकसद सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाना था।
आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका की पांच ढाल
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
सुरक्षा को और बेहतर बनाने के लिए क्या किया?
अमेरिका ने आतंकी हमलों के बाद अपनी सुरक्षा व्यवस्था में कई बड़े बदलाव किए। इसी कड़ी में होमलैंड सिक्योरिटी विभाग (डीएचएस) बनाया गया। इसे 25 नवंबर 2002 को ‘होमलैंड सिक्योरिटी एक्ट’ के तहत स्थापित किया गया। वहीं, मार्च 2003 में इसने काम करना शुरू किया। यह 1947 में रक्षा विभाग के गठन के बाद अमेरिकी संघीय सरकार का सबसे बड़ा पुनर्गठन था।
डीएचएस का मुख्य मकसद क्या है?
डीएचएस का मुख्य मकसद देश को आतंकवाद और दूसरे सुरक्षा खतरों से बचाना था। इसके तहत अलग-अलग सरकारी एजेंसियों को एक साथ लाया गया, ताकि उनके बीच बेहतर तालमेल हो सके। कुल 22 एजेंसियों और कार्यालयों को मिलाकर एक कैबिनेट स्तर का विभाग बनाया गया। टॉम रिज इसके पहले सचिव बने।
डीएचएस को क्यों आलोचना का सामना करना पड़ा?
हालांकि, शुरुआत में डीएचएस को कामकाज में तालमेल की कमी और नौकरशाही जैसी समस्याओं को लेकर आलोचना का सामना करना पड़ा। 2005 में आए तूफान कैटरीना के दौरान भी इसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठे। इसके अलावा निगरानी और नागरिक अधिकारों को लेकर भी चिंताएं सामने आईं।
डीएचएस ने लोगों को आतंकवादी खतरों के बारे में जानकारी देने के लिए सुरक्षा चेतावनी प्रणाली शुरू की, जिसे बाद में 2011 में नेशनल टेररिज्म एडवाइजरी सिस्टम से बदल दिया गया। इसका उद्देश्य आतंकवाद से निपटने के साथ देश की आपदा और आपातकालीन तैयारियों को मजबूत करना था।
हवाई यात्रा की सुरक्षा के लिए अमेरिका ने क्या कदम उठाया?
अमेरिका ने हवाई यात्रा की सुरक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव किए। 19 नवंबर 2001 को विमानन और परिवहन सुरक्षा अधिनियम (ATSA) के तहत ट्रांसपोर्टेशन सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन (TSA) की स्थापना की गई। इसका मकसद हवाई यात्रा को आतंकी हमलों और दूसरी सुरक्षा चुनौतियों से बचाना था।
इस नई व्यवस्था के तहत एयरपोर्ट के सुरक्षा चेकपॉइंट को संघीय निगरानी में लाया गया। यात्रियों व उनके सामान की जांच की जिम्मेदारी टीएसए को दी गई। यात्रियों और सामान की स्क्रीनिंग के लिए संघीय कर्मचारियों की व्यवस्था करने को कहा इसके साथ ही, चेक-इन किए गए 100 फीसदी सामान की स्क्रीनिंग करने का लक्ष्य रखा गया।
सुरक्षा जांच में सिर्फ यात्रियों की तलाशी ही नहीं, बल्कि विस्फोटक, हथियार और दूसरे प्रतिबंधित सामान का पता लगाने वाली तकनीक को भी इस्तेमाल किया गया। इसके अलावा एयरपोर्ट सुरक्षा व्यवस्था को संघीय स्तर पर मजबूत किया गया और फेडरल एयर मार्शल सर्विस का विस्तार किया गया। विमानों के कॉकपिट के दरवाजों को भी ज्यादा सुरक्षित बनाने के निर्देश दिए गए।
9/11 के बाद क्या-क्या हुआ?
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विदेशी यात्रियों की जांच को और सख्त किया गया
अमेरिका ने हवाई यात्रा की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए यात्रियों की जांच को अधिक जोखिम-आधारित और खुफिया जानकारी पर आधारित बनाया। इसका उद्देश्य यह था कि सुरक्षा एजेंसियां सभी यात्रियों पर एक जैसी जांच करने के बजाय उन यात्रियों पर ज्यादा ध्यान दें, जिनसे सुरक्षा को अधिक खतरा माना जाता है। इसके लिए यात्रियों की यात्रा से पहले उपलब्ध जानकारी की जांच और विश्लेषण पर जोर दिया गया।
हमलों के बाद अमेरिका ने राष्ट्रीय सुरक्षा प्रवेश-निकास पंजीकरण प्रणाली (NSEERS) शुरू किया। इसके तहत कुछ खास (मध्य-पूर्व और हाई-रिस्क) देशों के विदेशी पुरुषों को अमेरिका में प्रवेश करते समय उंगलियों के निशान, तस्वीरें और अतिरिक्त पूछताछ के दौर से गुजरना अनिवार्य कर दिया गया। अमेरिका जाने वाली अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए अंतिम प्रस्थान वाले हवाई अड्डों को कड़े सुरक्षा मानकों का पालन करना जरूरी किया गया। हालांकि टीएसए विदेशों में सीधे यात्रियों की स्क्रीनिंग नहीं करता, लेकिन वह दूसरे देशों को जोखिम-आधारित सुरक्षा रणनीतियों, स्क्रीनिंग तकनीकों और हवाईअड्डा सुरक्षा प्रबंधन की ट्रेनिंग देता है।
इसके अलावा, यात्रियों की संदिग्ध गतिविधियों को पहचानने के लिए एयरलाइंस और फ्लाइट अटेंडेंट संगठनों के साथ मिलकर व्यवहार पहचान और प्रतिक्रिया प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया। इसका उद्देश्य चालक दल को संदिग्ध गतिविधियों के संकेत पहचानने, उन पर प्रतिक्रिया देने और उनकी रिपोर्ट करने में सक्षम बनाना था।
सुरक्ष और खुफिया एजेंसियों को मजबूत करने के लिए क्या किया?
अमेरिका ने आतंकवाद से निपटने के लिए सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के बीच अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सूचना साझा करने को काफी बढ़ाया। इसका मकसद था कि किसी देश में मौजूद आतंकियों, उनकी गतिविधियों और संभावित हमलों से जुड़ी जानकारी दूसरे देशों तक समय रहते पहुंच सके। अमेरिका ने कई देशों के साथ द्विपक्षीय और बहुपक्षीय स्तर पर खुफिया तथा कानून-प्रवर्तन सूचनाओं के आदान-प्रदान को तेज किया।
नाटो ने क्या किया?
नाटो ने भी 9/11 के बाद आतंकवाद से जुड़ी खुफिया जानकारी साझा करने को बढ़ाया। नाटो और उसके साझेदार देशों की नागरिक और सैन्य खुफिया एजेंसियों से मिलने वाली सूचनाओं के विश्लेषण के लिए टेररिस्ट थ्रेट इंटेलिजेंस यूनिट बनाई गई। इसका उद्देश्य आतंकवाद से जुड़े खतरों का आकलन करना और नाटो के नेतृत्व को जानकारी उपलब्ध कराना था।
अमेरिका से भारत की पांच बड़ी सीख
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भारत को इससे क्या सीख लेनी चाहिए?
भारत के लिए सबसे बड़ी सीख है कि आतंकवाद से निपटने के लिए सिर्फ हमले के बाद कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। खुफिया एजेंसियों के बीच रियल-टाइम सूचना साझा करने और तालमेल को और मजबूत करना जरूरी है। आतंकियों की फंडिंग, हथियारों की सप्लाई और ऑनलाइन कट्टरपंथ पर पहले से नजर रखनी चाहिए। साथ ही, केंद्र और राज्यों की सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय और दूसरे देशों के साथ खुफिया जानकारी साझा करने की व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए।
पिछले 10 साल के भीतर भारत में हुए प्रमुख आतंकी घटना
1) पठानकोट एयरबेस हमला-2016
2 जनवरी 2016 को पंजाब के पठानकोट स्थित भारतीय वायुसेना स्टेशन पर आतंकियों ने हमला किया। जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े आतंकियों ने एयरबेस में घुसकर सुरक्षा बलों को निशाना बनाया। करीब चार दिन तक चले अभियान में सभी हमलावर मारे गए। इस हमले में सात सुरक्षाकर्मी शहीद हुए।
2) उरी आतंकी हमला-2016
18 सितंबर 2016 को जम्मू-कश्मीर के उरी में सेना के ब्रिगेड मुख्यालय पर आतंकियों ने हमला किया। जैश-ए-मोहम्मद के चार आतंकियों ने जवानों को निशाना बनाया। हमले में 19 भारतीय सैनिक शहीद हुए और कई अन्य घायल हुए। इसके जवाब में भारत ने 29 सितंबर को नियंत्रण रेखा पार सर्जिकल स्ट्राइक की।
3) अमरनाथ यात्रा आतंकी हमला- 2017
10 जुलाई 2017 को जम्मू-कश्मीर में अमरनाथ यात्रियों की बस पर आतंकियों ने हमला किया। अनंतनाग जिले में हुए इस हमले में सात श्रद्धालुओं की मौत हुई और कई लोग घायल हुए। आतंकियों ने बस पर गोलीबारी की। यह हमला धार्मिक यात्रियों को निशाना बनाने की वजह से देशभर में चर्चा में रहा।
4) सुंजवां हमला-2018
10 फरवरी 2018 को जम्मू के सुंजवां सैन्य शिविर पर जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने हमला किया। आतंकियों ने सेना के आवासीय परिसर में घुसकर गोलीबारी की। करीब दो दिन चले अभियान में सभी हमलावर मारे गए। हमले में छह सैनिक और एक नागरिक की मौत हुई, जबकि कई लोग घायल हुए।
5) पुलवामा आतंकी हमला-2019
14 फरवरी 2019 को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आत्मघाती हमला हुआ। जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी ने विस्फोटक से भरी कार काफिले से टकरा दी। हमले में 40 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए। इसके बाद भारत ने 26 फरवरी 2019 को पाकिस्तान के बालाकोट में एयरस्ट्राइक की।
6) राजौरी आतंकी हमला- 2023
1 जनवरी 2023 को जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले के धनगरी गांव में आतंकियों ने नागरिकों को निशाना बनाया। गोलीबारी और बाद में हुए विस्फोट में सात लोगों की मौत हुई, जबकि कई अन्य घायल हुए। घटना के बाद इलाके में बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान चलाया गया और सुरक्षा बढ़ाई गई।
7) पहलगाम आतंकी हमला -2025
22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम स्थित बैसरन घाटी में आतंकियों ने पर्यटकों को निशाना बनाया। हमले में 26 लोगों की मौत हुई, जिनमें ज्यादातर पर्यटक थे। कई लोग घायल भी हुए। इसके बाद भारत ने पाकिस्तान के नौ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया।