रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन
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बीस साल पहले दिसंबर 1999 में बोरिस येल्तसिन के राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने के बाद व्लादिमीर पुतिन को अगले चुनाव तक रुस का कार्यकारी राष्ट्रपति बनाया गया। जिसके बाद मार्च 2000 में 53 फीसदी मतों से जीतने के बाद व्लादिमीर पुतिन रुस में पहली बार राष्ट्रपति पद के लिए चुने गए। तब किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि पुतिन का कार्यकाल इतना लंबा होगा।
ज्यादातर पश्चिमी नेताओं से उलट, पुतिन के कार्यकाल में बहुत कम समय को छोड़ दे तो काफी स्थिरता बनी रही है। 2012 में क्रेमलिन के वापसी के बाद हाल ही में मॉस्को में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुआ और हजारों लोगों की गिरफ्तारी पुतिन के लिए सबसे बड़ा झटका था।
रूसी संविधान के अनुसार यह पुतिन का आखिरी कार्यकाल है। पुतिन राष्ट्रपति पद की दौड़ से बाहर हैं पर मीडिया में पुतिन की छवि और उनके रुतबे के चलते उनके उत्तराधिकारी का चुनाव काफी कठिन होने वाला है। रूस में उनके जाने के बाद पैदा होने वाले शून्य को भरने वाली कोई शख्सियत नहीं है। कुछ विश्लेषकों का ऐसा मानना है कि सबसे लंबे समय तक रूस की राजनीति में बने रहने वाले नेता स्टालिन की तरह 2024 में पुतिन पूरी तरह से सत्ता नही छोड़ेंगे।
उस समय स्थिति अलग थी जब पुतिन साल 2000 में बोरिस येल्तसिन के इस्तीफा देने के बाद चुनकर सत्ता में आए थे। पत्रकार निकोलाई स्वानिद्ज़े का कहना है कि गरीबी और आपराधिकता जैसी समस्याओं के बावजूद रूस अब भी एक लोकतांत्रिक और उदारवादी देश है। निकोलाई वो पत्रकार है जिन्होंने क्रेमलिन की जीत के बाद पुतिन के शुरूआती दौर में उनके काफी इंटरव्यू किए थे। उन्होंने कहा कि 20 साल शासन करने के बाद अब पुतिन किसी भी तौर से सीमित नही है। वे व्यावहारिक रूप से एक सुल्तान है।
विश्लेषक कोंस्तांतिन कलचेव का मानना है कि 2004 में यूक्रेन में ऑरेंज क्रांति, जिसमें क्रेमलिन का मानना था कि क्रांति के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है जो विश्व में रूस का प्रभाव कम करना चाहती है। पुतिन को उनका व्यवहार उन्हें बदलकर कठोरता की तरफ जाने के लिए मजबूर किया।