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दक्षिण चीन सागर में किसका हक?: ड्रैगन के दावों पर 14 देशों और EU ने जताई आपत्ति; बीजिंग ने क्या कहा?

Sun, 12 Jul 2026 02:59 PM IST
निर्मल कांत वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, मनीला।

सार

दक्षिण चीन सागर पर चीन के दावों को लेकर अमेरिका, ब्रिटेन समेत 14 देशों और यूरोपीय संघ ने 2016 के अंतरराष्ट्रीय फैसले का समर्थन दोहराया है। चीन ने इस फैसले को खारिज करते हुए अपने दावों पर कायम रहने की बात कही है। क्या है पूरा मामला, पढ़िए रिपोर्ट-
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दक्षिण चीन सागर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक/एएनआई (फाइल)
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विस्तार
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अमेरिका, ब्रिटेन और कई अन्य पश्चिमी व एशियाई देशों ने रविवार को फिर कहा कि दक्षिण चीन सागर पर चीन के बड़े दावे 2016 के मध्यस्थता फैसले के आधार पर गैरकानूनी हैं। 14 देशों की ओर से एक संयुक्त बयान जारी किया गया। इसमें कहा गया कि उन्होंने विवादित समुद्री क्षेत्र में उन 'अस्थिरता पैदा करने वाली' कार्रवाइयों को खारिज किया है, जो क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा हैं।
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27 देशों वाले यूरोपीय संघ (ईयू) ने भी अलग बयान जारी किया। 2016 के फैसले को 'विवादों के शांतिपूर्ण समाधान में एक अहम फैसला' बताते हुए उसका समर्थन दोहराया।

इन बयानों में 12 जुलाई 2016 को आए उस मध्यस्थता फैसले को याद किया गया। समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र समझौते के तहत हेग में बनाए गए न्यायाधिकरण ने यह फैसला दिया था। इन देशों ने कहा कि यह अहम फैसला 'अंतिम और कानूनी रूप से बाध्यकारी' है। 
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चीन ने फैसले को लेकर क्या कहा?
चीन ने रविवार को फिर कहा कि यह फैसला अमान्य है और इसका कोई कानूनी प्रभाव नहीं है। बीजिंग ने कहा कि वह इसे न तो स्वीकार करता है। न ही मान्यता देता है।

2013 में फिलीपींस की ओर से शुरू की गई मध्यस्थता प्रक्रिया में चीन शामिल नहीं हुआ था। इससे पहले 2012 में विवादित समुद्री क्षेत्र में दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण गतिरोध हुआ था, जिसके बाद चीन ने एक विवादित चट्टानी क्षेत्र पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था।

बीजिंग ने 2016 के फैसले को मानने से इनकार कर दिया और आज भी लगभग पूरे दक्षिण चीन सागर पर अपना अधिकार जताता है। यह इलाका दुनिया के सबसे अहम व्यापारिक समुद्री मार्गों में शामिल है। इसे एशिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक माना जाता है। इस क्षेत्र में चीन के अलावा फिलीपींस, वियतनाम, मलयेशिया, ब्रुनेई और ताइवान के बीच भी कई बार क्षेत्रीय विवाद सामने आए हैं। 

क्या कहा 14 देशों ने?
अमेरिका के नेतृत्व वाले बयान में कहा गया, हम मध्यस्थता न्यायाधिकरण के फैसले को दोहराते हैं कि दक्षिण चीन सागर में चीन के बड़े समुद्री दावों का कोई कानूनी आधार नहीं है। इसमें वे दावे भी शामिल हैं, जो ऐतिहासिक अधिकारों के आधार पर किए जाते हैं। 

मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने काफी हद तक फिलीपींस के पक्ष में फैसला दिया था। न्यायाधिकरण ने कहा था कि समुद्र से जुड़े संयुक्त राष्ट्र कानून के तहत दक्षिण चीन सागर के उन इलाकों में मौजूद संसाधनों पर चीन का ऐतिहासिक अधिकार जताने का कोई कानूनी आधार नहीं है, जो उसके मान्य क्षेत्र में नहीं आते।

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समुद्र और महासागरों से जुड़े नियमों को तय करने वाला यह समझौता 1994 में लागू हुआ था। इसे चीन और फिलीपींस समेत 170 से अधिक देशों और पक्षों ने मंजूरी दी है।

किन देशों ने किया समर्थन?
  • अमेरिका और ब्रिटेन के अलावा बयान जारी करने वाले देशों में फिलीपींस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा, जर्मनी, इटली, एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया, रोमानिया और स्लोवेनिया शामिल हैं।
  • इन देशों ने कहा, हम क्षेत्र में शांति और स्थिरता को खतरे में डालने वाली किसी भी अस्थिर या एकतरफा कार्रवाई का कड़ा विरोध करते हैं, जिसमें बल या दबाव का इस्तेमाल भी शामिल है।
  • उन्होंने कहा कि तटरक्षक बल, सैन्य बल और समुद्री मिलिशिया के जरिये दूसरे देशों की समुद्री या हवाई गतिविधियों में बाधा डालना, डराना या परेशान करना स्वीकार नहीं किया जाएगा।
  • उन्होंने कहा कि ऐसी गतिविधियां कर्मचारियों और मछुआरों की सुरक्षा को खतरे में डालती हैं और क्षेत्रीय शांति व सुरक्षा को कमजोर करती हैं।
  • देशों ने कहा कि समुद्र में जहाजों की आवाजाही और हवाई उड़ानों की स्वतंत्रता बनी रहनी चाहिए।
  • उन्होंने जोर दिया कि समुद्री विवादों का समाधान 1982 के संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून समझौते के अनुसार शांतिपूर्ण तरीके से किया जाना चाहिए।

चीन ने फिर फैसले पर उठाए सवाल
चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि मध्यस्थता न्यायाधिकरण और उसका फैसला 'अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की सामान्य प्रक्रिया का गंभीर उल्लंघन करता है।' मंत्रालय ने कहा कि यह फैसला एक संप्रभु देश और समुद्री कानून समझौते के सदस्य के तौर पर चीन के अधिकारों का उल्लंघन करता है। 

चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा, चीन इन फैसलों के आधार पर किए गए किसी भी दावे या कार्रवाई का विरोध करता है और उसे कभी स्वीकार नहीं करेगा। मंत्रालय ने यह भी कहा कि बीजिंग किसी तीसरे पक्ष के जरिये विवाद समाधान या चीन पर थोपा गया कोई समाधान स्वीकार नहीं करेगा।

विवादित समुद्री क्षेत्र में बढ़े टकराव?
विवादित समुद्री क्षेत्र में हाल के वर्षों में टकराव बढ़े हैं। खासकर चीनी और फिलीपीनी तथा वियतनामी बलों और मछली पकड़ने वाले जहाजों के बीच तनाव ज्यादा देखा गया है।

चीनी तटरक्षक जहाजों और उनके सहयोगी जहाजों ने फिलीपींस के बलों और अन्य दावेदार देशों के मछुआरों के खिलाफ तेज पानी की बौछार करने वाले उपकरणों, सैन्य स्तर के लेजर और खतरनाक तरीके से रास्ता रोकने जैसी कार्रवाइयों का इस्तेमाल किया है। इससे समुद्र में टक्कर और हवा में जोखिम भरी घटनाएं हुई हैं।
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अमेरिका लगातार चीन से 2016 के मध्यस्थता फैसले का पालन करने की मांग करता रहा है। पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन और मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन दोनों ने कहा है कि अगर विवादित समुद्री क्षेत्र में फिलीपींस के बलों, जहाजों या विमानों पर सशस्त्र हमला होता है तो अमेरिका एशिया में अपने सबसे पुराने सहयोगी फिलीपींस की रक्षा करने के लिए बाध्य है।
 
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