चीन-पाकिस्तान इकॉनमिक कोरिडोर (सीपीईसी) के दस साल पूरा होने के मौके पर इस परियोजना के लिए बनी संयुक्त समन्वय समिति की एक विशेष बैठक मंगलवार को बीजिंग में होगी। पाकिस्तान के योजना और विकास मंत्री अहसान इकबाल इस बैठक में पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे। बताया गया है कि इसमें सीपीईसी की भावी दिशा तय की जाएगी।
सीपीईसी चीन की महत्त्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) परियोजना का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इस योजना को लागू करने पर सहमति पांच जुलाई 2013 को बनी थी, जब पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने बीजिंग में इससे संबंधित करार पर दस्तखत किए थे।
सीपीईसी के तहत एक गलियारा बनाने पर काम आगे बढ़ा है, जिसके जरिए पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिम में स्थित ग्वादार बंदरगाह को चीन के शिनजियांग प्रांत में स्थित काशगार से जोड़ा गया है। इस पूरे रास्ते में परिवहन मार्ग के साथ-साथ बिजली संयंत्र और उद्योग भी लगाए गए हैं।
इस बीच इस परियोजना की दसवीं सालगिरह के मौके पर यहां इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है कि क्या इसमें शामिल होकर पाकिस्तान ने खुद को चीन के कर्ज जाल में फंसा लिया है। पश्चिमी विश्लेषकों की दलील रही है कि चीन और पाकिस्तान की सरकारें इस परियोजना के असली रूप को छिपाने की कोशिश में लगी रही हैं। सीपीईसी परियोजना की आरंभिक लागत 43 बिलियन डॉलर बताई गई थी। लेकिन अब यह 62 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई है। इनमें से ज्यादातर रकम का निवेश चीन सरकार और वहां की कंपनियों ने किया है। पाकिस्तान को देर-सबेर यह कर्ज उतारना होगा।
अमेरिका का विदेश मंत्रालय आरोप लगा चुका है कि चीन ने पाकिस्तान का शोषण करने के नजरिए से कर्ज दिया है। इसके पीछे चीन का भू-राजनीतिक मकसद महत्त्वपूर्ण है। अमेरिकी विशेषज्ञों ने यह भी दावा किया है कि सीपीईसी की शर्तें चीनी कंपनियों के हित में हैं, जबकि पाकिस्तान के ऊपर इस सिलसिले मे जितना कर्ज चढ़ गया है, उसके लिए उसे चुकाना संभव नहीं है।
पाकिस्तान में चल रही बहस में एक समूह की तरफ से इन तर्कों को दोहराया जा रहा है। इसमें बताया गया है कि फरवरी 2023 तक पाकिस्तान पर कुल विदेशी कर्ज 100 बिलियन डॉलर से अधिक का हो चुका था, जिसमें 30 बिलियन डॉलर अकेले चीन का कर्ज है। लेकिन सीपीईसी समर्थक समूहों का कहना है कि पश्चिमी विश्लेषण एकतरफा है, जिसका मकसद पाकिस्तान में भय पैदा करना है। उनका कहना है कि सीपीईसी एक ऐसी परियोजना है, जिसमें दोनों देशों की सरकारों ने निवेश किया है। इसके अलावा इस परियोजना के कारण विभिन्न क्षेत्रों में चीन का निजी निवेश पाकिस्तान आया है। मसलन, चीन के एक कंपनी समूह ने पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में 40 फीसदी हिस्सा खरीद लिया है। उधर अलीबाबा ग्रुप ने टेलनॉर माइक्रोफाइनेंस बैंक में 45 फीसदी हिस्सा खरीदा है।
सीपीईसी की दसवीं सालगिरह पर चल रही बहस से यह सामने आया है कि पाकिस्तानी मीडिया और बौद्धिक वर्ग में एक बड़ा तबका चीनी परियोजना का समर्थक है। जबकि थिंक टैंक और गैर-सरकारी संगठनों के एक बड़े हिस्से में इसका विरोध है।