जो बाइडन ने व्हाइट हाउस में अपने 100 दिन पूरे कर लिए हैं। इस दौर के बारे में जो आकलन यहां किए गए हैं, उनमें इस बात पर लगभग आम सहमति है कि घरेलू मामलों में तो व्हाइट हाउस की नीति में भारी बदलाव आया है, लेकिन विदेश नीति में जो बाइडन भी लगभग पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति पर ही चल रहे हैं। फरवरी में दिए विदेश नीति संबंधी अपने पहले प्रमुख भाषण में बाइडन ने कहा कि ‘अमेरिका लौट आया है, कूटनीति की वापसी हो गई है।’ लेकिन विश्लेषकों के मुताबिक असल में ऐसा नहीं हुआ है।
जानकारों का कहना है कि बाइडन के राष्ट्रपति बनने से अमेरिका के सहयोगी देशों में ये उम्मीद पैदा हुई थी कि अब अमेरिका अकेले चलने की उस नीति को छोड़ देगा, जो ट्रंप के कार्यकाल में अपनाई गई थी। लेकिन 100 दिन बाद अब उन देशों में ये चर्चा शुरू होती दिख रही है कि बाइडन की बातों पर आखिरी कितना भरोसा किया जा सकता है। ये कथन अब आम हो चला है कि ट्रंपिज्म (ट्रंपवाद) अभी भी जिंदा है।
ट्रंप की नीति से अलग हटते हुए जो कदम बाइडन प्रशासन ने उठाए, उनमें विश्व स्वास्थ्य संगठन और जलवायु परिवर्तन रोकने की पेरिस संधि में अमेरिका की वापसी, कुछ मुस्लिम देशों के नागरिकों के अमेरिका आने पर लगाई गई रोक को हटाना और आव्रजकों को रोकने के लिए मेक्सिको से लगी सीमा पर बन रही दीवार के लिए धन रोकने जैसे फैसले शामिल हैं। जलवायु परिवर्तन रोकने की कोशिशों में अमेरिकी नेतृत्व को फिर से स्थापित करने के लिए बाइडन ने पिछले दिनों 40 देशों की वर्चुअल शिखर बैठक की मेजबानी की।
लेकिन चीन और ईरान के मामले में जो बाइडन के समय भी अमेरिका का सख्त रुख बना हुआ है। बल्कि चीन के खिलाफ सहयोगी देशों की गोलबंदी करने में बाइडन प्रशासन ने ज्यादा तेजी दिखाई है। ईरान के साथ परमाणु डील में अमेरिका को वापस करने के लिए उसने नई शर्तें लगा दी हैं। कोरोना वायरस की वैक्सीन दुनिया को उपलब्ध कराने में उसने कोई दिलचस्पी नहीं ली है। इसके बदले इस मामले में वह अमेरिका फर्स्ट की नीति पर चला है। शरणार्थियों को अमेरिका आने देने की नीति के मामले भी बाइडन प्रशासन का रुख पूर्व राष्ट्रपति के जैसा ही सख्त है। ट्रंप ने एक साल में सिर्फ 15 हजार शरणार्थियों को आने देने की नीति तय की थी। बाइडन ने इसे बढ़ा कर सवा लाख शरणार्थी करने का वादा किया था। लेकिन अब उन्होंने कह दिया है कि 15 हजार की सीमा कायम रहेगी।
विश्लेषकों ने कहा है कि चीन, ईरान और शरणार्थी अमेरिका में संवेदनशील मुद्दे हैं। इन मामलों में नरमी दिखा कर बाइडन ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी को यह आरोप लगाने का मौका नहीं देना चाहते हैं कि उनका प्रशासन राष्ट्रीय हितों से समझौता कर रहा है। इसी तरह वैक्सीन के मामले में उन्होंने संदेश देने कोशिश की है कि उनके प्रशासन के लिए अमेरिकी नागरिकों के हित ही सर्वोच्च हैं।
अफगानिस्तान के मामले में भी बाइडन प्रशासन का ऐसा ही रुख सामने आया है। ट्रंप ने वहां से सभी अमेरिकी फौजियों की वापसी को सुनिश्चित करने के लिए तालिबान से समझौता कर लिया था। बाइडन ने अमेरिकी सैनिकों की वापसी की समयसीमा चार महीने और जरूर बढ़ा दी है, लेकिन अफगानिस्तान को अस्थिरता और तालिबान शासन की वापसी के अंदेशों की चिंता ना करते हुए सभी अमेरिकी फौजियों को वापस बुला लेने की नीति पर वे कायम हैं।
बाइडन के व्हाइट हाउस में आने के बाद अमेरिका ने सीरिया पर फिर बमबारी की। यह भी एक तरह से ट्रंप की नीति को जारी रखना ही है। उधर बाइडन प्रशासन के दौर में भी सऊदी अरब के प्रति अमेरिका का नरम रुख बना हुआ है। पत्रकार अदनान खशोगी की हत्या के मामले में ये जाहिर हुआ, जब अमेरिकी एजेंसियों की जांच में दोषी पाए गए सऊदी प्रिंस सलमान पर अमेरिका ने कोई प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया। यानी यहां भी बाइडन प्रशासन ने न्याय के सिद्धांत पर अमेरिकी हित यानी अमेरिका फर्स्ट की नीति को तरजीह दी।