हमारे देश में आज भी शिक्षा को लेकर बहुत कुछ करना बाकी है। बहुत कुछ होना बाकी है। जब तक हम शिक्षित समाज नहीं बनाएंगे, तब तक हमारी समझ विकसित नहीं और जब तक समझ विकसित नहीं होगी, हमारा संपूर्ण विकास नहीं होगा। यह फिल्म जिसका कि नाम 'शिकाईसाल' है, वह हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर करार प्रहार करती है। मैंने कोशिश की है अपनी व्यवस्था की परतें खोलने की। पता नहीं कितना सफल हो पाई हूं, यह तो दर्शक ही बताएंगे। लेकिन इतना है कि जिस विषय को लेकर मैंने फिल्म बनाई है, वह एक वृहद विषय है। यह कहते हुए चेहरा सुकून से खिल जाता है शिकाईसाल फिल्म की लेखिका और डायरेक्टर डॉ. बॉबी शर्मा बरुआ का। उनकी फिल्म 28वें कोलकाता अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में दिखाई जाएगी। अमर उजाला से खास बातचीत में डॉ. बरुआ ने कहा, फिल्म हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर करारा तंज कसती है।
एक सवाल के जवाब में डॉ. बरुआ ने कहा, यह फिल्म असम के एक जिले की है, कार्बी आंगलोंग। वहां की तिवी भाषा पर यह फिल्म बनाई है। यह अपनी तरह की एक मात्र फिल्म है। पूरी शूटिंग हमने वहीं पर शूट की। यह बहुत ही पिछड़ा हुआ क्षेत्र है। इसके साथ ही यह भी कि ग्रामीण लोग बच्चों को पढ़ाने की जगह काम कराते हैं, ताकि परिवार की आय बढ़े और परिवार का जीवन-यापन चलता रहे। लेकिल मुझे लगता है कि पढ़ाई हर इंसान का पहला अधिकार है और वह उसे मिलना चाहिए।
डॉ. बरुआ ने कहा, वास्तव में इसमें एक शिक्षक का संघर्ष है। कैसे एक पेड़ के नीचे बच्चों को लेकर एक शिक्षक, शिक्षा की रोशनी जलाने की कोशिश करता है। किस तरह कई शिक्षक ग्रामीण परिवेश में कठिन परिस्थितियों शिक्षा की जोत को थामे हुए हैं। लेकिन मैंने दिखाने की कोशिश की है कि किसी व्यक्ति की मेहनत को, सरकारी तंत्र किस तरह से पंगु बना देता है। फिल्म में एक शिक्षक हैं, जो अपनी मेहनत से गांव के बच्चों को पढ़ाते हैं। किस तरह से बच्चों को एकत्रित करते हैं, एक स्कूल की शुरुआत करते हैं और फिर उसे बढ़ाते हैं। वह स्कूल जब बच्चों से भरने लगता है तो सरकार उसे अपना लेती है। फिर किस तरह से उस अध्यापक के रिटायर्ड होने के बाद उस स्कूल का पतन होने लगता है। कैसे उस स्कूल में बच्चे कम होने लगते हैं। कैसे स्कूल में अध्यापकों की कमी होने से बच्चे फिर स्कूल छोड़ने लगते हैं। इसके बाद फिर कैसे शिक्षक एक बार फिर संघर्ष करता है और अपने स्कूल को बचाते हैं और बच्चों को जोड़ कर फिर से नई शुरुआत करता है।
डॉ. बरुआ कहती हैं, अगर मैं अपने फिल्म के माध्यम से कुछ कह पाऊं, तो यह मेरे लिए सौभाग्य होगा क्योंकि बच्चों को शिक्षित किए बिना हम कुछ भी कर लें, उसकी कोई गिनती नहीं।