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किसी दिन

abhinav bhoyar

Mere Alfaz
                                    
                     
                                                  इस बेज़ार दौर के उस पार

हम फिर मिलेंगे |

थामेंगे हाथ फिर से,

मिलाएंगे नज़रे भी,

तब यह फ़ासला भी ज़रूरी ना होगा,

कसकर लग जायेंगे एक दूसरे भी,

और एक दूजे की आग़ोश में

रुके हुए अश्को को

बेहिसाब बहने देंगे

जब किसी दिन

इस बेज़ार दौर के उस पार हम फिर मिलेंगे |



एक दूजे से फ़ासले के इस दौर ने

यह महसूस करा दिया है,

की हक़ीक़त में रूबरू होने की बात

कुछ और ही होती है |

दिन तो गुज़र जाता है काम काज में

पर यह कम्भख्त रात,

साथ ज़िन्दगी बिताने के

अधूरे ख़्वाबों में डूबी

आखों को कहा सोने देती है |

अलहिदा एक दूजे से हम

यूँ तो अनजान है इस बात से की

परेशान इन अधूरे ख़्वाबों से न जाने

कब तक रहेंगे |

पर यकीन है मुझे इन्ही ख़्वाबों को

पूरा कर हम हक़ीक़त में ज़रूर बदलेंगे

जब किसी दिन

इस बेज़ार दौर के उस पार

हम फिर मिलेंगे |



सफ़र तय ही कितना किया है

साथ हमने,

अभी तो मिलो दूर तक साथ चलना बाकी है |

दिन पहला पहर भी नहीं बीता

जब से साथ हुए है,

अभी तो कई शामें, कई रातें साथ बीतने बाकी है |

हालात कितना ही उलझा क्यों ना दे

इस रिश्ते की डोर को,

यक़ीन है मुझे हम इसे सुलझा भी लेंगे |

क्या हुआ जो सफ़र छूट गया बीच में ही,

हम फिर वही से शुरुआत करेंगे |

कैफ़ियत चाहे जैसी हो ज़िन्दगी की,

हम एक दूसरे के होकर रहेंगे |

जब किसी दिन

इस बेज़ार दौर के उस पार।

हम फिर मिलेंगे |

अभिनव 

- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 months ago
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