लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘दिमागी नक्सलियों’ को लेकर चेताया... और अगले ही दिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने ऐसा पलटवार किया, जिसने सियासी बहस को और गरमा दिया। चिदंबरम ने कहा “मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व है।” आखिर पीएम मोदी ने ‘दिमागी नक्सल’ किसे कहा? और क्यों कांग्रेस अब इस बयान को सामाजिक न्याय, जातिगत जनगणना और सरकार की नीतियों से जोड़ रही है? स्वतंत्रता दिवस के मंच से शुरू हुई ये बहस अब सीधे सत्ता और विपक्ष के बीच वैचारिक टकराव में बदलती दिख रही है।
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नक्सलवाद और माओवाद के खिलाफ सरकार की कार्रवाई का जिक्र किया। पीएम मोदी ने कहा कि देश जंगलों में सक्रिय सशस्त्र नक्सलवाद को खत्म करने में काफी हद तक सफल रहा है, लेकिन अब चुनौती उसके वैचारिक समर्थकों से है।
प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि माओवादी सोच वाले कुछ लोग लंबे समय तक सत्ता के गलियारों में अपनी जगह बनाने में कामयाब रहे। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग सरकारी समितियों में सलाहकार के तौर पर काम करते थे और सार्वजनिक नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश करते थे। पीएम ने देशवासियों को ऐसे लोगों को पहचानने और उनसे सतर्क रहने की अपील की।
पीएम मोदी ने यह भी कहा कि इस चुनौती को कम करके नहीं आंका जा सकता। उनके मुताबिक, दशकों तक नक्सलवाद और माओवादी हिंसा ने लाखों युवाओं का भविष्य बर्बाद किया और कई परिवारों को तबाह किया। प्रधानमंत्री ने दावा किया कि इस संघर्ष में 3,500 से ज्यादा पुलिसकर्मी और सुरक्षाकर्मी मारे गए।
पीएम के इसी बयान के बाद कांग्रेस ने मोर्चा खोल दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रधानमंत्री की टिप्पणी का जवाब देते हुए लिखा “मुझे ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है।”
चिदंबरम के इस बयान ने राजनीतिक बहस को नया मोड़ दे दिया। वहीं कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी प्रधानमंत्री के बयान पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि आखिर सामाजिक न्याय की मांग करना क्या ‘दिमागी नक्सल’ होना है?
जयराम रमेश ने जातिगत जनगणना का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जो लोग जातिगत जनगणना की मांग कर रहे थे, उन्हें लंबे समय तक विरोध का सामना करना पड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार से सवाल पूछने या उसकी नीतियों को चुनौती देने वालों को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है।
दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में नक्सलवाद के हिंसक स्वरूप और उसके वैचारिक समर्थकों के बीच अंतर करते हुए चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि बंदूक के दम पर देश के बड़े हिस्से को प्रभावित करने वाला नक्सलवाद अब कमजोर हो रहा है और जिन इलाकों में कभी हिंसा होती थी, वहां विकास और भरोसे का माहौल बन रहा है।
लेकिन विपक्ष अब ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान को लेकर सरकार पर हमलावर है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वालों को इस तरह के लेबल देना लोकतांत्रिक बहस को कमजोर करता है।
यानी एक तरफ प्रधानमंत्री का दावा है कि देश नक्सलवाद के हिंसक दौर से बाहर निकल रहा है, तो दूसरी तरफ ‘दिमागी नक्सल’ की परिभाषा को लेकर सत्ता और विपक्ष आमने-सामने हैं। स्वतंत्रता दिवस के मंच से शुरू हुआ यह मुद्दा अब संसद और सियासी गलियारों में नई बहस का कारण बनता दिख रहा है।