काशीपुर। रसायन उर्वरकों का अंधाधुंध उपयोग करने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति घट रही है। खेतों की मिट्टी के ऊसर होने का खतरा हो गया है। कृषि वैज्ञानिक एवं कृषि विज्ञान केंद्र प्रभारी डॉ. जितेंद्र क्वात्रा ने किसानों को सचेत करते हुए कृषि भूमि को ऊसर होने से बचाने के लिए हरी खाद उगाने की सलाह दी। सोमवार को डॉ. क्वात्रा ने बताया कि रसायन उर्वरकों का असंतुलित उपयोग और मिट्टी का लगातार दोहन करने, फसल चक्र के अनुसार फसलें नहीं उगाने से एक ही फसल कटने के बाद फिर वही फसल उगाने से जिले की कृषि भूमि में जीवांश की मात्रा और उर्वरा शक्ति कम हो रही है। जिससे कृषि भूमि उसर हो रही है, जो गंभीर चिंता का विषय है। डॉ. क्वात्रा ने कहा कि ढैचा व दलहनी फसलों से भी खेतों को पोषक तत्व मिलते हैं और जीवांश की मात्रा बढ़ती है। डॉ. क्वात्रा ने कहा कि हरी खाद के रूप में ढैचा सबसे उपयुक्त हैं। गेहूं की फसल कटाई के बाद खेत में ढैचा की फसल की बुआई करनी चाहिए। एक एकड़ में आठ दस किलो ढैचा का बीज लगता है। जब इसकी ऊंचाई छह सात फिट हो जाती है। तब ट्रैक्टर के कल्टीवेटर से ढैचा की फसल पलट देना चाहिए। ढैचा पलटने के चार पांच दिन बाद खेत में धान की रोपाई की जा सकती है। ढैचा से खेत की भौतिक, रसायनिक एवं जैविक संरचना में वृद्धि होती है। मृदा उर्वरकता में जल धारण करने की क्षमता बढ़ जाती है। खरपतवार नियंत्रण भी हो जाता है। हरी खाद से रसायन खादों की अपेक्षा फसलों के उत्पादन में काफी वृद्धि होती है। डॉ. क्वात्रा ने किसानों से खेतों को उपजाऊ बनाने के लिए हरी खाद के रूप में ढैचा की फसल बोने का आह्वान किया।