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पंतनगर विवि: धान की भूसी और गुड़ से तैयार होगा फसलों को बीमारियों से बचाने वाला ट्राइकोडर्मा, मिला पेटेंट

Tue, 03 Nov 2026 11:38 AM IST
गायत्री जोशी सुरेंद्र कुमार वर्मा

सार

धान की भूसी और गुड़ से तैयार ट्राइकोडर्मा अब फसलों को मिट्टी से फैलने वाली बीमारियों से बचाने में मदद करेगा। पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इसकी नई तकनीक विकसित की है, जिसे भारतीय पेटेंट मिल गया है।
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वैज्ञानिकों द्वारा धान की भूसी और गुड़ से बनाया गया ट्राइकोडर्मा। - फोटो : फाइल फोटो
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विस्तार
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धान की भूसी और गुड़ से अब फसलों को मिट्टी में पनपने वाली बीमारियों से बचाने में मदद मिलेगी। पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इनसे ट्राइकोडर्मा तैयार करने की नई तकनीक विकसित की है। इसे तकनीक को भारतीय पेटेंट मिल गया है। इससे खेती में रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम करने और कृषि अपशिष्ट का बेहतर इस्तेमाल करने की राह खुल सकती है।

गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के पादप रोग विज्ञान विभाग की डॉ. नंदानी शुक्ला और पूर्व प्राध्यापक एवं कुलपति डॉ. जे. कुमार ने यह तकनीक विकसित की है। इसमें धान की भूसी से तैयार बायोचार में गुड़ मिलाकर ट्राइकोडर्मा का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सकता है। ट्राइकोडर्मा एक उपयोगी जैव नियंत्रण कवक है, जिसका इस्तेमाल मिट्टी से फैलने वाले पौधों के रोगों को नियंत्रित करने और पौधों का स्वास्थ्य बेहतर बनाने में किया जाता है।

डॉ. नंदानी शुक्ला ने बताया कि खेती में रासायनिक कीटनाशकों और फफूंदनाशकों का इस्तेमाल कम करने के लिए प्रभावी जैव नियंत्रक एजेंट विकसित करना जरूरी है। हालांकि इनका बड़े पैमाने पर उत्पादन करने और भंडारण के दौरान उनकी जीवित संख्या बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होता है। नई तकनीक से इन समस्याओं का समाधान करने का प्रयास किया गया है।

ऐसे बनता है पर्यावरण अनुकूल ट्राइकोडर्मा

इसमें धान की भूसी से बने बायोचार और गुड़ का उपयोग कर ट्राइकोडर्मा का संवर्धन किया जाता है। इससे लंबे समय तक भंडारण योग्य जैव उत्पाद तैयार करने में मदद मिलती है। यह तकनीक कृषि अपशिष्ट के उपयोग का भी अच्छा उदाहरण है। धान की भूसी, जिसे अक्सर बेकार समझा जाता है, उसे बायोचार में बदलकर उपयोगी जैव उत्पाद बनाने में इस्तेमाल किया गया है। इससे कम लागत में जैव नियंत्रक तैयार करने और रसायन आधारित रोग प्रबंधन के विकल्प विकसित करने की संभावनाएं बढ़ेंगी। ऐसी तकनीकें पर्यावरण के अनुकूल खेती को भी बढ़ावा दे सकती हैं।

कोटइस तकनीक का प्रभावी उत्पादन, गुणवत्ता नियंत्रण और व्यापक स्तर पर उपयोग में सुनिश्चित किया जाता है, तो यह किसानों को जैव नियंत्रण आधारित पादप रोग प्रबंधन के लिए उपयोगी विकल्प उपलब्ध कराने में योगदान दे सकती है। तैयार फॉर्मूलेशन की अपेक्षाकृत लंबी भंडारण अवधि और बीज व मृदा उपचार में सीधे उपयोग की संभावना इसके व्यावहारिक महत्व को बढ़ाती है। -डाॅ. एसके कश्यप, कुलपति, गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विवि

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