जसपुर। मोहर्रम में ढोल बजाने की वर्षों पुरानी परंपरा इस बार भी नहीं निभाई जाएगी। ढोल पर रोक का यह दूसरा साल है। कमेटी के इस निर्णय से उलेमा एवं आम लोगों में खुशी है। इस्लामी नए साल के मोहर्रम माह की पहली तारीख से दस दिन तक अखाड़ा, अलमदारी, जुलूस आदि कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इनमें छोटे-बड़े ढोल बजाने की वर्षों पुरानी परंपरा भी शामिल है। मोहल्ला जटवारा, जामा मस्जिद अखाड़ा कमेटी के सदर माजिद हुसैन के मुताबिक पिछले वर्ष उलेमा ने उनकी कमेटी को बताया था कि इस्लाम धर्म में मोहर्रम व अन्य किसी मौके पर भी ढोल बजाना जायज नहीं। इससे ध्वनि प्रदूषण तो होता ही है साथ ही कर्बला के शहीदों के सम्मान को ठेस पहुंचती है। उलेमा के निर्देशों का पालन करते हुए कमेटी के सभी सदस्यों ने उसी दिन निर्णय लिया था कि मोहर्रम में ढोल न बजाकर पूरी अकीदत से कर्बला के शहीदों को याद किया जाएगा। वहां नायब सदर साजिद हुसैन, सचिव मो. शाहनवाज, नावेद आलम आदि थे।