काशीपुर। कोरोना संक्रमण के चलते प्रयागराज में आयोजित सम्मान समारोह नही हो सका। आयोजक संस्था ने पुरुस्कार के लिए चयनित शिक्षिका शगुफ्ता रहमान की रचनाओ को लेकर ऑनलाइन परिचर्चा कराई। कवयित्री नीना मोहन श्रीवास्तव ने कहा कि शगुफ़्ता की रचनाओं मे धारा प्रवाह आत्माभिव्यक्ति की झलक मिलती है, जो मन में उठने वाले भावों को उद्वेलित करती है। उनकी कविताएं सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करती हैं। कवि जमादार धीरज ने कहा कि शगुफ़्ता रहमान ने कविताएं हिंदी की सहज सरल भाषा में भी छंद अनुशासन का ध्यान रखते हुए रची है। इनमें लयात्मकता के साथ भरपूर रसात्मकता भी हैं। विषय वस्तु में देशभक्ति, आपसी सदभाव प्रकृति और मौसम का सौंदर्य पर्यावरण के साथ पारिवारिक रिश्ते और सामाजिक सरोकारों पर बहुत सजकता से लेखनी चला रही है। साहित्यकार रमोला रूथ लाल ने कहा कि कृत्रिमता से दूर, सीधी, सहज और स्पष्ट भाषा में शगुफ़्ता रहमान ने जिंदगी के बहुत सारे पक्षों जैसे वतन परस्ती, जग में नवाचार लाने की इच्छा, बुजुर्गों का सम्मान, मनुष्य की पहचान, प्रेम, भाईचारा, स्त्री विमर्श, संघर्ष आदि को छूने का प्रयास किया है। जीवन को बनाने वाली मां, परिवार में खुशियां बिखेरने वाली बेटियां और पति के कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली स्त्री के किरदार को शगुफ्ता की रचनाओं मे सम्मान दिया गया है। संजय सक्सेना ने कहा कि शगु़फ्ता रहमान एक सशक्त कवयित्री हैं, उनकी कलम समाज के विभिन्न आयाम पर बखूबी चलती है। उनकी कई कविताएं प्रेम रस में डूबी हुई है और प्रेम की गहराइयों को इंगित करती हैं। उनकी लेखनी समाज में गिरते संस्कारो के प्रति भी चिंतित है और समुन्द्र मंथन के द्वारा सामाजिक विसंगतियों को निकाल बाहर करना चाहती है। परिचर्चा में सुरेश चंद्र द्विवेदी, मनमोहन सिंह तन्हा, अर्चना जायसवाल ‘सरताज’, नरेश महारानी, रचना सक्सेना, ऋतंधरा मिश्रा, अतिया नूर, दयाशंकर प्रसाद, डॉ. ममता सरूनाथ, डाॅ. इसरार अहमद और सागर होशियारपुरी आदि साहित्यकारों ने भी भाग लिया। परिचर्चा का संयोजन गुफ्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया।