काशीपुर। एक व्यक्ति के खाते से रुपये निकालने के लिए मां-बेटी के खिलाफ दायर निगरानी याचिका द्वितीय एडीजे कोर्ट ने सुनवाई के बाद खारिज कर दी। कोर्ट ने अपने आदेश में इसे लेन-देन के विवाद के कारण मामला सिविल प्रवृत्ति का बताया।
कविनगर कॉलोनी निवासी मनीष कुमार ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से अवर न्यायालय में 156 (3) सीआरपीसी के तहत प्रार्थना पत्र देकर बताया कि उसकी मां रेखा देवी का निधन जून 2006 में हो गया था, तब से तीनों भाई अपने पिता खेम सिंह के साथ रहते थे। कुछ समय बाद रामनगर की एक फैक्टरी में काम करने वाली महिला ने अपने पति पर प्रताड़ना के आरोप लगा उसके पिता से मदद मांगी। इसलिए खेम सिंह ने उस महिला को अपने साथ रख लिया।
आरोप है कि उसके पिता को विश्वास में लेकर महिला उनका मकान तक बिकवा कर सारी रकम उसके पिता के बैंक खाते में जमा करा दी। महिला और उसकी बेटी पिता का एटीएम कार्ड लेकर पीरुमदारा चली गई। महिला और उसकी बेटी ने अन्य लोगों से साठगांठ कर सारी राशि अपने खातों में ट्रांसफर कर ली। एक जून 2020 को उसके पिता का स्वर्गवास हो गया। अस्पताल का बिल चुकाने के लिए महिला ने बमुश्किल तीस हजार रुपये दिए।
अंतिम संस्कार के अगले दिन दोनों मां-बेटी उनके घर से ढाई लाख रुपये के जेवरात और एक लाख रुपये की नकदी लेकर चली गईं। सुनवाई कर कोर्ट ने एक दिसंबर को प्रार्थना पत्र निरस्त कर दिया। इस आदेश के खिलाफ मनीष ने द्वितीय एडीजे के न्यायालय में निगरानी याचिका प्रस्तुत की। प्रतिवादी पक्ष की ओर से अमरीश अग्रवाल एडवोकेट ने पैरवी की। दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने मामले को सिविल प्रवृत्ति का मानते हुए याचिका को खारिज कर दिया।