पंतनगर। तराई में हुई बेमौसमी बारिश से खेत में पककर तैयार गेहूं के काला पड़ने की संभावना है। जीबी पंत कृषि विश्वविद्यालय के गेहूं वैज्ञानिक (मुख्य गेहूं प्रजनक) डॉ. जेपी जायसवाल और फसल अनुसंधान केंद्र के संयुक्त निदेशक डॉ. एसके वर्मा ने बताया कि मार्च के अंत में जब गेहूं की फसल पककर कटने के लिए तैयार है तब बेमौसम बारिश किसानों पर प्राकृतिक आपदा बनकर आई है।
बेमौसम बारिश के चलते नवंबर में बोई (अगेती) गेहूं की फसल में पानी रूकने से फंगल संक्रमण के कारण दाना काला पड़ने की पूरी संभावना है। जिसके चलते इस गेहूं के आटे का रंग हल्का मटमैला होने सहित पौष्टिक क्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इस समस्या का कोई वैज्ञानिक समाधान उपलब्ध नहीं है। बताया कि इस आटे को पीसकर खाने में कोई समस्या नहीं हैै। इसे जानवरों को भी खिलाया जा सकता है। बारिश के बाद तेज धूप निकलेगी। वैज्ञानिकों ने किसानों को राय दी है कि पकी फसल को अच्छी तरह सूखने के बाद ही कटाई कर थ्रेसिग करें। अधिक देरी भी न करें कि जमीन में गिरी गेहूं की बालियों से मिट्टी के संपर्क में आने पर अंकुरण शुरू हो जाए। बताया कि तेज हवा से गिरी फसल की हाथों से कटाई कर थ्रेसिंग करें। कंबाइन से कटाई व थ्रेसिंग करने में गेहूं के पौधे बालियों सहित नीचे छूट जाएंगे।
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पछेती गेहूं को नहीं कोई नुकसान
पंतनगर। वैज्ञानिकों ने बताया कि देर से दिसंबर में बोई (पछेती) गेहूं की फसल को इस बेमौसम बारिश से कोई नुकसान नहीं है। क्योंकि दाना बनते समय फसल को सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसके अलावा तेज हवा के कारण गिरे पौधे कुछ समय बाद खड़े हो जाते हैं, या पकने के बाद हाथ से काट लिए जाते हैं। दाना बनते समय बारिश से दाने काले पड़नें की संभावना भी नहीं के बराबर होती है। संवाद