एनएच-74 की जद में आई काशीपुर तहसील की गिन्नीखेड़ा और खड़कपुर देवीपुरा की तीन जमीनों को पिछली तारीख में 143 कराकर मुआवजे के खेल खेलने वालों ने कारनामा किया था। उन्होंने जो खतौनी अस्तित्व में ही नहीं थी उनमें पिछली तारीख में की गई 143 के आदेश चढ़ा दिए थे। एडीएम नजूल कोर्ट ने तीनों मामलों की सुनवाई के बाद पूरी प्रक्रिया को फर्जी करार दिया है। तीनों ही मामलों में काशीपुर की एसडीएम कोर्ट पहले ही पिछली तारीख में अकृषक की गई जमीन को कृषि घोषित कर चुका है।
बता दें कि काशीपुर के गिन्नीखेड़ा निवासी बलवंत सिंह, ग्राम खड़कपुर देवीपुरा निवासी प्यारा सिंह, कश्मीर कौर और अमरजीत कौर की जमीनें एनएच चौड़ीकरण की जद में आ रही थी। इसके बाद अफसरों, कर्मचारियों और काश्तकारों ने सांठगांठ कर जमीनों को पिछली तारीख में 143 कराई थी और करोड़ों का मुआवजा हासिल कर लिया था। अकृषक हुई तीनों जमीनों में कृषि होती पाई गई थी। इसके बाद 12 अप्रैल 2017 को एसडीएम कोर्ट ने तीनों जमीनों की श्रेणी को सुनवाई के बाद अकृषक से बदलकर कृषि कर दी थी। इसके खिलाफ भूस्वामियों ने एडीएम नजूल जगदीश चंद्र कांडपाल की कोर्ट में वाद दाखिल किया था।
उन्होंने एसडीएम को क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर गलत फैसले देने सहित अनेक आरोप लगाए थे। एडीएम कोर्ट ने माना कि तीनों मामलों में जमीनों की 143 का आदेश 30 सितंबर 2010 को किया गया था। इस पारित आदेश का अंकन खतौनी प्यारा सिंह, कश्मीर कौर, अमरजीत कौर के मामले में 1420 से 1425 और बलवंत सिंह के मामले में खतौनी 1421 से 1426 में दर्शाया गया है। आदेश का अंकन 1418 फसरी में बलवंत के मामले में 25 फरवरी 2011, यारा और अन्य के मामले में 18 मई 2011 को अंकित किया गया है। दोनों ही मामलों में उक्त 25 फरवरी 2011 और 18 मई 2011 को खतौनी अस्तित्व में ही नहीं थी। कोर्ट ने 143 की प्रक्रिया को ही गलत करार देते हुए अपील खारिज की है।
तीनों मामलों में डीपी ने किया था खेल
रुद्रपुर। काशीपुर तहसील के जिन तीन मामलों में एडीएम कोर्ट ने 143 की प्रकिया को खारिज किया है। जेल गए पीसीएस अफसर डीपी सिंह ने इनमें ही खेल किया था। अगस्त 2016 के दूसरे हफ्ते में काशीपुर के तत्कालीन एसडीएम ने तत्कालीन एसएलओ डीपी सिंह को पत्र भेजा था। इसमें कहा गया था कि उक्त जमीनों पर कृषि हो रही है, लिहाजा इसमें अकृषि की दर से मुआवजे का भुगतान नहीं किया जाए।
डीपी ने पत्र को रिसीव करने के बाद भी इसे दरकिनार कर काश्तकारों को अकृषि की दर से करीब 45 करोड़ रुपयों का मुआवजा बांटा था। मुआवजा बंटने के एक हफ्ते बाद भी तत्कालीन एसडीएम ने उक्त जमीनों पर खेती होने की बात कहकर पत्र भेजा था, लेकिन डीपी ने उसे भी नजरअंदाज कर दिया था।