मंडी परिषद की मल्टी ग्रेन प्रोसेसिंग यूनिट बनकर तैयार हो गई है। उत्तर भारत की पहली प्रसंस्करण इकाई (प्रोसेसिंग यूनिट) अक्तूबर के पहले सप्ताह से काम करना शुरू कर देगी। इसमें किसान, व्यापारी, सोसायटी निर्धारित शुल्क चुकाकर मोटे और छोटे अनाज का मानकीकरण, छंटाई और पॉलिश करा सकेंगे। इससे किसानों को उपज के बेहतर दाम मिल सकेंगे। मंडी ने इकाई को चलाने के लिए त्रेता नेचुरल एग्रो लिमिटेड कंपनी से अनुबंध किया है।
मंडी परिषद ने सिडकुल में खाली पड़ी जमीन में करीब 17 करोड़ रुपये की लागत से किसानों और व्यापारियों की सुविधा के लिए इकाई लगाई है। इसमें मोटे या छोटे अनाज की गुणवत्ता में सुधार के बाद पैकिंग की भी सुविधा होगी। मोटे अनाज में राजमा, गहत, सोयाबीन, उड़द आदि दालें आती हैं तो छोटे अनाज में शामिल चौलाई, मडुवा, झंगोरा आदि की छंटाई, पॉलिश और पैकिंग की जाएगी। किसान अपने उत्पाद की पैकिंग पर अपना लोगो भी लगा सकेंगे।
मंडी परिषद के महाप्रबंधक (तकनीकी) विजय कुमार ने बताया कि उत्तर भारत की यह पहली यूनिट होगी, जिसमें चौलाई के लिए कलर साल्टर भी लगाया गया है। मडुवे की रोस्टिंग की सुविधा भी होगी। बताया कि अनुबंधित कंपनी मंडी को 100 रुपये प्रति टन शुल्क देगी। मशीन चलाने, कर्मचारियों सहित अन्य खर्चे उसे खुद वहन करने होंगे। कंपनी ही माल लाने वाले किसान, व्यापारियों से शुल्क लेगी।
जैविक प्रमाणीकरण की व्यवस्था भी होगी
महाप्रबंधक तकनीकी विजय कुमार ने बताया कि यूनिट में जैविक उत्पाद प्रमाणीकरण की व्यवस्था भी होगी। इसमें उत्पाद लाने वाले किसानों को प्राथमिकता दी जाएगी। उनके लिए 25 फीसदी का कोटा रखा गया है। वहीं माल रखने के लिए 100 टन की क्षमता का कोल्ड स्टोर भी बनाया गया है। हर दो महीने में मंडी की गठित कमेटी यूनिट का निरीक्षण करेगी। झंगोरा, मडुवे की प्रसंस्करण का शुल्क 1600 रुपये निर्धारित है। ऐसे ही अन्य अनाजों के लिए शुल्क रखा गया है।
जापान से मिला 60 टन मडुवे का आर्डर
अभी यूनिट ने काम करना शुरू भी नहीं किया है, लेकिन कंपनी को आर्डर मिलना शुरू हो गया है। महाप्रबंधक प्रशासन बीएस चलाल ने बताया कि जापान से 60 टन मडुवे की मांग आई है। इसके लिए जिलों में कलस्टर बनाकर स्वयंसेवी संस्थाएं किसानों से मडुवा एकत्र कर प्रसंस्करण के लिए यूनिट तक पहुंचाएंगी।