किसी जमाने में कांग्रेस की दबदबे वाली काशीपुर विधानसभा में पार्टी 32 सालों से जीत के लिए तरस रही है। यूपी के जमाने में एनडी तिवारी आखिरी नेता थे जो पार्टी के टिकट से जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। उसके बाद से शुरू हुआ हार का सिलसिला उत्तराखंड बनने के बाद हुए तीन चुनावों तक जारी रहा। इसे संगठन की कमजोरी कहे या अन्य कारण लेकिन कांग्रेस जनता के टूटे विश्वास को दोबारा हासिल करने में आज तक असफल रही है। हार के तिलिस्म को तोड़ने के लिए पार्टी आलाकमान सोच समझकर और जिताऊ प्रत्याशी को मैदान में उतारने के लिए माथापच्ची कर रहा है।
आजादी के बाद 1952 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लक्ष्मण दत्त भट्ट 13 हजार 408 मतों के अंतर से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के रामदत्त जोशी को हराकर लखनऊ विधानसभा पहुंचे थे। 1957 में कांग्रेस से लक्ष्मण दत्त भट्ट और 1962 में पार्टी के देवीदत्त छिम्वाल ने रामदत्त जोशी को हराया था। 1967 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के रामदत्त जोशी ने कांग्रेस के एनडी तिवारी को 1577 वोटों से शिकस्त दी थी। लेकिन 1969 में हुए चुनाव में दमदार वापसी कर एनडी ने रामदत्त को 17 हजार 472 मतों से शिकस्त दी थी। 1974 में एनडी तिवारी ने भारतीय क्रांति दल के गनपत सिंह, वर्ष 1977 में जनता पार्टी के गोविंद सिंह को हराया। 1980 में हुए चुनाव में कांग्रेस से सत्येंद्र चंद्र गुड़िया ने जनता पार्टी के रविंद्र प्रसाद को हराया। वर्ष 85 में कांग्रेस के एनडी तिवारी ने लोकदल के अनवर अहमद को हराया था।
उसके बाद कांग्रेस की हार का सिलसिला शुरू हो गया था। वर्ष 89 में निर्दलीय मैदान में उतरे केसी बाबा ने कांग्रेस के हरगोविंद प्रसाद को हराया। 1991 में चली रामलहर में भाजपा के राजीव अग्रवाल जीते और वर्ष 93 में भी राजीव को जीत हासिल हुई। 1996 में ऑल इंडिया कांग्रेस तिवारी से खड़े केसी बाबा ने बीजेपी के राजीव अग्रवाल को हराया था। उत्तराखंड बनने के बाद हुए 2002, 2007 और 2012 के चुनाव में भाजपा ने परचम लहराया था। लगातार कांग्रेस की हार की बड़ी वजह गुटबाजी भी रही है। आलाकमान के समक्ष बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर गुटबाजी थामने और जिताऊ प्रत्याशी को घोषित करने की है। जिसके लिए मंथन का दौर जारी है।
दो चुनाव में जीतते-जीतते रह गई थी कांग्रेस
उत्तराखंड बनने के बाद हुए तीन चुनाव में से दो चुनाव कांग्रेस पार्टी जीतते-जीतते रह गई थी। वर्ष 2002 में हुए चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी केसी सिंह बाबा महज 195 वोटों के अंतर से हारे थे। जबकि 2012 के चुनाव में नामांकन प्रक्रिया शुरू होने के बाद तक टिकट को लेकर हां या ना का दौर चलता रहा। नामांकन प्रक्रिया के आखिरी दौर में मनोज जोशी का टिकट घोषित हुआ था और वे भी 2382 वोटों से हारे थे।