अभावों में रहकर शिक्षा ग्रहण करने वाले रूबैद खान बच्चों को दे रहे हैं निशुल्क शिक्षा
शांतिपुरी। कहते हैं हालात इंसान को तोड़ देते हैं और इस आपाधापी में कुछ लोग जीवन का रण छोड़ देते हैं। वहीं, कुछ लोग इस जीवन पथ पर लगातार संघर्ष कर अपनी छाप समाज में छोड़ते हैं। अभावों में पलकर और बमुश्किल शिक्षित हुए रूबैद खान उन्हीं में से एक हैं। खुरपिया गेट गांव निवासी रूबैद ने आठ साल पहले गोकुलनगर में छायादार पेड़ के नीचे निशुल्क शिक्षण की शुरूआत की थी। इसके बाद शांतिपुरी नंबर-दो और अब नगला डेरी फार्म में भी मजदूरों के बच्चों को पढ़ा रहे हैं। उनके सेंटर में शांतिपुरी, आनंदपुर नाला, पंतनगर, नगला डेरी, नगला और गोलगेट नाला आदि जगहों से करीब 150 बच्चे पढ़ने आते हैं। संवाद
मजदूरों के बच्चों को देखकर मिली प्रेरणा
रूबैद बताते हैं कि गांव में अधिकतर लोग पैसों की तंगी के कारण या तो पढ़ाई छोड़ देते हैं, या फिर स्कूल ही नहीं जाते। जब वह नौवीं कक्षा के छात्र थे तो गांव के आसपास मजदूरों के साथ उनके बच्चों को भी काम करते देखते थे। इस पर उन्होंने इन बच्चों को भी पढ़ाने की ठानी। शुरुआत में उन्होंने छोटे बच्चों को शिक्षा पढ़ाया। फिर धीरे-धीरे कारवां बढ़ता चला गया।
पढ़ाई में क्या रखा है...
बच्चों का साक्षर करने के अभियान के दौरान रूबैद को विरोध का भी सामना करना पड़ा। उनकी कक्षाओं में लड़कियां भी आती थीं, जिसे लेकर लोगों तरह-तरह की बातें करते थे। नगला में वाले उनके केंद्र को तो तीन बार बंद कराया गया। कुछ लोग जो बच्चों से मजदूरी करवा रहे थे उन्होंने भी कमाई कम होने पर उनका विरोध किया। ये लोग कहते थे कि पढ़ाई में क्या रखा है। हालांकि बाद में समझाने पर वह मान गए।
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रोजाना करते हैं 35 किमी का सफर
रूबैद सुबह पांच से सात बजे तक और दोपहर एक से रात नौ बजे तक बच्चों को पढ़ाते हैं। इसके लिए उन्हें रोजाना कुल 35 किमी का सफर तय करना पड़ता है। सात से एक बजे का जो समय बचता है, उसमें वह अपनी पढ़ाई और घर के काम निपटाते हैं। खर्चा कैसे चलता है... पूछने पर वह हंसते हुए कहते हैं कि उनकी कक्षा में कुछ संपन्न परिवार के बच्चे भी आ जाते हैं, जिनसे वह मात्र 200 रुपये लेते हैं। इसी से उनका खर्च चल जाता है।
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जहां मिली जगह वहां चली क्लास
24 वर्षीय रूबैद के परिवार में आठ लोग हैं। वह कहते हैं आज समाज में लोगों को कम से कम 12वीं तक तो जरूरत पढ़ा होना चाहिए। शिक्षित व्यक्ति ही एक अच्छे समाज का निर्माण करता है। इसी सोच को केंद्र में रखकर उन्होंने अपनी मुहिम शुरू की थी। उन्होंने बच्चोें की पढ़ाई के साथ उनकी सहूलियत का ध्यान रखा। बच्चों को उनके घरों के आसपास ही शिक्षा देने के लिए उन्हें जहां जगह मिली, उन्होंनें वहीं कक्षाएं चालू कीं। फिर चाहे वह जंगल के पास हो, घास का मैदान हो या फिर कोई झोपड़ी।
फोटो 11पी: शांतिपुरी में गरीब बच्चों को पढ़ाते हुए रुबैद खान।