हरिद्वार जिले के सांसद रहे पूर्व मुख्यमंत्री का क्षेत्र में प्रभाव माना जाता है। पिछले विधानसभा चुनाव में उन्हें सीएम पद का उम्मीदवार घोषित किया गया तो जिले की जनता ने उन्हें निराश नहीं किया। इस बार जिला पंचायत चुनाव में उनकी अनुपस्थिति के चलते संगठन को ऊर्जा नहीं मिल पाई। पिछले पंचायत चुनाव में उन्होंने कई दिन तक क्षेत्र में डेरा डाले रखा था।
पूर्व सीएम हरीश रावत के बिना हरिद्वार जिले की कांग्रेस अधूरी है। चाहे वे सांसद रहे हों या फिर मुख्यमंत्री, हरिद्वार क्षेत्र में उनके ताबड़तोड़ दौरे होते रहे। इसी का फायदा चुनाव में उनकी उपस्थिति से भी मिलता है। विधानसभा चुनाव में सीएम पद के दावेदार घोषित होने पर जिले के लोगों ने उन्हें काफी सीटें दी लेकिन जिला पंचायत चुनाव में उनकी दूरी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
पूरे चुनाव प्रचार के दौरान एक बार भी हरीश रावत क्षेत्र में नहीं दिखे। माना जा रहा है कि स्थानीय विधायकों एवं जिला पंचायत के प्रत्याशियों की ओर से भी उनका अपेक्षित सहयोग नहीं लिया गया। पिछले चुनाव में उन्होंने काफी मेहनत की थी। शायद यही कारण था कि कांग्रेस 11 सीटें जीतने में कामयाब रही। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि देहात क्षेत्र की कई सीटों पर हरीश रावत का व्यक्तिगत प्रभाव है। उनका दौरा होता तो कांग्रेस तीन से चार सीटें ज्यादा जीतने में कामयाब रहती।