आज से चैत्रमास के नवरात्र शुरू हो रहे हैं। श्रद्धालु अपने घरों में कलश स्थापित कर जौ की हरियाली बोते हैं। कलश स्थापना के साथ ही भक्तों को नौ दिवसीय पूजा-पाठ और व्रत शुरू हो जाएगा। श्रद्धालु विभिन्न मठ-मंदिर और सिद्ध पीठों के दर्शन करते हैं। इन्हीं में से एक प्राचीन सिद्धपीठ भद्रकाली मंदिर है। नवरात्र पर मंदिर में सुबह से शाम तक भक्तों की भीड़ उमड़ती है। मंदिर परिसर में महिला कीर्तन मंडली की ओर माता के भजनों की प्रस्तुति दी जाती है।
गंगोत्री राजमार्ग पर भद्र पर्वत की तलहटी पर मां भद्रकाली का सिद्धपीठ मंदिर है। मंदिर के पुजारी पंडित धनवीर श्रीयाल बताते हैं, स्कंदपुराण में वर्णित है कि मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां काली ने असुर रक्तबीज का यहां वध किया था। उन्होंने बताया कि रक्तबीज को वरदान था कि धरती पर उसके रक्त की बूंद जहां-जहां गिरेगी उस स्थान पर राक्षसों की उत्पत्ति होगी।
तब मां दुर्गा ने काली का रूप धारण कर इस स्थान पर रक्तबीज का वध किया था। जिसके कारण इस स्थान का नाम भद्रकाली हो गया। उन्होंने बताया कि भद्रकाली चारधाम यात्रा का पहला पड़ाव है। यात्रा शुरू होते ही इस मंदिर में पूजा-अर्चना होती है। साथ ही श्रद्धालु मांगलिक कार्यक्रम का शुभारंभ करने से पहले मां भद्रकाली के दर्शन कर आशीर्वाद लेते हैं।