पिथौरागढ़। लोकपर्व गमरा महोत्सव कुमाऊं की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। मानव जीवन के कठोर पलों में, पहाड़ के संघर्षमयी वातावरण में अपने कष्टों और मुसीबतों को भूलने के लिए कभी प्रकृति के प्रति आभार, कभी मौसम के बदलाव को, सुख को प्राप्त करने को, नीरस जीवन की उदासी दूर करने के लिए लोकपर्व मनाए जाते हैं। इन्हीं में विशिष्ट स्थान रखता है गौरा महेश्वर पूजन या गमरा महोत्सव। इसे कुमाऊं में सातूं-आठूं पर्व के रूप में मनाते हैं।
पुराणों में वर्णित है कि शिव की पत्नी गौरी (अपभ्रंश-गौरा) ने शिव से विवाह हेतु तप किया था। गौरा हिमालय की पुत्री थी तथा उनके शिव से विवाह को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाने के लिए प्रत्येक वर्ष इस त्योहार को पूरे विश्वास तथा श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। आठूं के तीन दिन पहले पंच अनाज जिनमें गेहूँ, चने, गहत, उड़द, गुरूंश, कल्यूं को भिगोया जाता है। इस दिन को विरूड़ पंचमी कहते हैं। सातूं पर गौरा और आठूं पर महेश्वर की मूर्ति बनाकर पूजा होती है। तीन दिन बाद इन मूर्तियों का विसर्जन किया जाता है।