संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़। सीमांत जिले के आपदा की दृष्टि से अति संवेदनशील 22 गांवों के लोग पिछले कई सालों से विस्थापन का इंतजार कर रहे हैं। इन गांवों के विस्थापन की फाइलें तहसील व जिला स्तर पर लंबित चल रही हैं जिस कारण इन गांवों का आजतक विस्थापन नहीं हो पाया है। आलम ये है इन गांवों के ग्रामीण मानसून काल में आपदा के खौफ के साये में जी रहे हैं इसके बाद भी इन गांवों के विस्थापन को लेकर कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। मानसून काल शुरू होने पर बस कुछ ही समय बचा हुआ है, लेकिन अभी तक आपदा के खौफ के साये में जी रहे ग्रामीणों के विस्थापन के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं। विस्थापन नहीं होने के कारण 211 से अधिक परिवार खतरे की जद में है। हद ये है कि प्रभावितों की लंगी मांग के बाद भी 10 अतिसंवेदनशील गांवों के विस्थापन की फाइल भी तहसील स्तर पर लंबित चल रही हैं। इन गांवों के विस्थापन के लिए जगह का चयन भी नहीं किया जा सका है।
-----:: ये गांव हैं अतिसंवेदनशील ::: कुलथम, सैनर, नई बस्ती, नाचनी, साईपोलो, भाट, जिप्ती, तांकुल, खुमती, कनार, तोमिक गोल्फा, छलमा छिलासो, हिमखोला, मेतली तोक, चाामी, जिमतड़, धारपांगू, सुवा तोक, बुंगबुंग, सिमयाखोला, रूकमा, सैन, कुजासु, गर्गुवा,तोकस्यारी,जम्कू, जुम्मातोक, भारभेली, तल्ला भदेली, न्वाली, सानीखेत, कुला, जुम्मा, गलांती, भतखान, रमतोली, तुसरानी,खातपोली, जामनी, जयकोट,भटीगांव,जोग्यूड़ा,ग्वीर, घटीगाड़, बसंतकोट, जीमिया, कैठी, रूईसपाटा, सोबला, न्यू सुवा, तोली घट्टाबगड़, न्यू सोबला, झिमरगांव।