पहाड़ के आंगन में सहजता से उगने वाले बेड़ू, तिमिल और पदम अब अपनी उम्र पूरी करने से पहले ही सूख रहे हैं। तनों और शाखाओं में लग रहे कीट, बढ़ता तापमान और बदलता मौसम इन पारंपरिक पेड़ों के अस्तित्व पर भारी पड़ रहा है। हालात यह हैं कि कई क्षेत्रों में इन प्रजातियों के 60 से 95 फीसदी तक पेड़ सूख चुके हैं। नई पौध तैयार न होने से आने वाले समय में इनकी संख्या और घटने की आशंका है।
एसएसजे विश्वविद्यालय के एलएसएम परिसर के वनस्पति विज्ञान के शोध में यह चिंताजनक स्थिति सामने आई है। शोध के अनुसार, उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में 1200 से 2400 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाने वाले पदम, बेड़ू, तिमिल और दुधिल समेत कई प्रजातियां तेजी से प्रभावित हो रही हैं।
इन पेड़ों के सूखने का प्रमुख कारण डाईबैक रोग बताया गया है। सेराम्बीसिडी परिवार के कुकड़ू कीट तने और शाखाओं में गहरे छेद कर देते हैं। इससे पेड़ में जल और पोषक तत्वों का संचार बाधित हो जाता है। प्रभावित पेड़ एक से दो साल के भीतर सूख जाते हैं।
बढ़ते तापमान और मौसम में बदलाव ने भी इन प्रजातियों के प्राकृतिक विकास को प्रभावित किया है। जलवायु परिवर्तन का असर पदम के फूलने के समय पर भी पड़ा है। शरद ऋतु में फूलने वाले पदम में अब कई बार असमय फूल आ रहे हैं। बर्फबारी या पाले की चपेट में आने से ये फूल नष्ट हो जाते हैं और बीज नहीं बन पाते। इससे प्राकृतिक पुनर्जनन की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
इसके अलावा चीड़ के जंगलों के विस्तार से जमीन पर पिरुल की मोटी परत जम रही है। इससे बीजों को मिट्टी और नमी नहीं मिल पाती और नई पौध का अंकुरण प्रभावित होता है। संवाद
कुमाऊं से गढ़वाल तक मौजूदगी
प्रभावित प्रजातियां कुमाऊं में रामगढ़, मुक्तेश्वर, जागेश्वर, बिनसर, रानीखेत, कांडा, कपकोट और पिथौरागढ़ में पाई जाती हैं। गढ़वाल के जोशीमठ, पीपलकोटी, हेलांग, उत्तरकाशी और टिहरी गढ़वाल में भी इनकी मौजूदगी है।
क्यों खास हैं बेड़ू-तिमिल-पदम
बेड़ू: पहाड़ों में पारंपरिक रूप से पाया जाने वाला फलदार पेड़ है। इसके फल ग्रामीण जीवन और स्थानीय खानपान का हिस्सा रहे हैं। बेड़ू उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में भी गहराई से जुड़ा है।
तिमिल: अंजीर प्रजाति का यह पेड़ पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके फल पक्षियों और अन्य जीवों के लिए भी भोजन का स्रोत हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इसका पारंपरिक उपयोग होता रहा है।
पदम: धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व वाला यह पेड़ पहाड़ी क्षेत्रों की पारंपरिक वनस्पतियों में शामिल है। इसके फूल और पेड़ स्थानीय परंपराओं से जुड़े हैं। इसके असमय फूलने और नई पौध तैयार न होने से अस्तित्व खतरे में है।
पर्वतीय प्रदेश में पदम, बेड़ू, तिमिल आदि प्रजाति के पेड़ों का तेजी से सूखकर गायब होना एक गंभीर चिंता का विषय है। इसका मुख्य कारण कीटों का हमला और पर्यावरण असंतुलन है। इन्हें संरक्षित करना अत्यंत आवश्यक है। - डॉ. कमलेश कुमार भाकुनी, विभागाध्यक्ष, वनस्पति विज्ञान, एलएसएम परिसर, पिथौरागढ़