पिथौरागढ़। अति दोहन के कारण खत्म होने की कगार पर पहुंच चुके उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थित बुग्यालों (घास के मैदान) में पाए जाने वाले सफेद बुरांश सहित अन्य दुर्लभ पेड़-पौधों को बचाने के लिए वन विभाग कार्ययोजना बना रहा है। इसके लिए बुग्यालों में पाए जाने वाले दुर्लभ पेड़-पौधों के दोहन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया जाएगा। यारसा गंबू (शक्तिवर्द्धक कीड़ाजड़ी) दोहन के लिए बुग्यालों में जाने वाले लोग जलाने के लिए इन पेड़-पौधों को काट देते हैं। इससे अधिकांश स्थानों से ये पेड़-पौधे लगभग गायब हो चुके हैं।
दो दशकों से यारसा गंबू के दोहन के लिए उच्च हिमालयी क्षेत्रों में 14,000 फीट की ऊंचाई तक स्थित बुग्यालों में लोगों की चहलकदमी बढ़ी है। यारसा गंबू निकालने के लिए लोग मार्च-अप्रैल से बुग्यालों में चले जाते हैं और लगभग दो से तीन महीने तक टेंट में रहते हैं। इस दौरान भोजन पकाने के लिए ये लोग दुर्लभ माने जाने वाले सफेद बुरांश, भोजपत्र और बिल्व के पेड़ों को काटकर जलाते हैं।
इस समय 10,000 से अधिक लोग इन बुग्यालों में जा रहे हैं। नेपाल से भी तस्करों के चोरी-छिपे यारसा गंबू के दोहन के लिए भारतीय बुग्यालाें में आकर वनस्पतियों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। पिछले 20 वर्षों में हर साल हजारों लोगों के बुग्यालों में जाकर इन चुनिंदा प्रजाति के पेड़-पौधों को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने से ये पेड़-पौधे लगभग समाप्ति की कगार पर पहुंच चुके हैं। संवाद
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इसलिए पड़ी जरूरत
बुग्याल वाले वनों के पंचायतों के अधीन होने के कारण वन विभाग अभी तक ग्रामीणों से पर्यावरण संरक्षण की अपील करता रहा है लेकिन इसका कोई विशेष असर नजर नहीं आ रहा है। जैव विविधता को खतरे में पड़ता देख आखिरकार वन विभाग ने इन पेड़-पौधों को बचाने के लिए ठोस कार्य योजना बनाने का काम शुरू कर दिया है।
यह भी जानें
मुनस्यारी और धारचूला के उच्च हिमालयी क्षेत्र में कई खूबसूरत बुग्याल हैं। नग्निधूरा, खेरलीवन, झंडाधार, पंचाचूली और धारचूला में छिपला केदार के चेरती और रक्षापुल स्थित बुग्यालों में यारसा गंबू मिलता है।
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यारसा गंबू दोहन के लिए बुग्यालों में लोगों की आवाजाही बढ़ी है। लोग सफेद बुरांश को काटकर जलाते हैं। इससे दुर्लभ प्रजाति के पेड़-पौधों को काफी नुकसान पहुंच रहा है। दुर्लभ वनस्पतियाें को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे। - जीवन मोहन दोगड़े, डीएफओ पिथौरागढ़।