पिथौरागढ़। स्टार्टअप हिम शिल्पी हुनर संस्था की ओर से रिंगाल हस्तकला को नए अंदाज में बाजार में उतारा जा रहा है। इससे न केवल लोगों को प्लास्टिक के सामान का विकल्प मिला है बल्कि विलुप्त हो रही रिंगाल हस्तशिल्प कला को भी पुनर्जीवन मिला है। अब संस्था रिंगाल से निर्मित सजावटी सामान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाने का प्रयास कर रही है।
उत्तराखंड में रिंगाल रोजगार का एक प्रमुख आधार है। पहले यहां के कई परिवारों की आजीविका रिंगाल हस्तशिल्प से ही चलती थी। रिंगाल से मुख्य रूप से पहले मोस्टा, डोका, सूप, सोजा, डलिया ही बनाए जाते थे। पहाड़ में कृषि कार्य सिमटने से रिंगाल उद्योग पर भी संकट आ गया था। इसे देखते हुए जिले के कमतोली में हिम शिल्पी कंपनी की शुरुआत करने वाले राजेंद्र पंत, निर्मल पंत और पंकज कार्की ने वर्ष 2021 में रिंगाल को नए स्वरूप में बाजार में उतारने की पहल शुरू की।
हिम शिल्पी कंपनी ने अब तक रिंगाल से लगभग 150 से अधिक उत्पादों को विकसित किया है। इनमें मुख्य रूप से किचन, ऑफिस, सजावटी उत्पाद शामिल किए गए। पूजा टोकरी, हॉटकेस, पैन स्टैंड, गुलदस्ता, सर्विस टोकरी, सब्जी टोकरी, विभिन प्रकार के लैंप, बैग, फाइल कवर, फाइल जब बाजार में उतारी गई तो लोगों ने इसे खूब पसंद किया। इसे किसी ट्रीटमेंट की जरूरत नहीं होती है। इससे बना सामान 20 से 25 साल तक खराब नहीं होता है।
रिंगाल की राखियों का भी हुआ अभिनव प्रयोग
पिथौरागढ़। रिंगाल से राखियां बनाने का अभिनव प्रयोग भी किया गया। इसमें महिला हस्तशिल्पियों की बनाई गई रिंगाल की राखियों को लोगों ने काफी पसंद किया। लगातार दो बार रिंगाल की राखियां सीमा पर तैनात सैनिकों के लिए भी भेजी गईं। रिंगाल के उत्पादों को भारत सरकार ने उत्तराखंड रिंगाल क्राफ्ट नाम से जीआई प्रमाण पत्र भी दिया गया है।
स्टार्टअप मिलने से उत्साहित हैं उद्यमी
पिथौरागढ़। आईआईएम काशीपुर में स्टार्टअप मिलने से हिम शिल्पी हुनर संस्था के पदाधिकारी काफी उत्साहित हैं। रमाकांत पंत ने बताया कि रिंगाल उत्पादों के बाजार को बढ़ाने और इसका राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार करने का प्रयास किया जा रहा है। बाजार की मांग को देखते हुए अब मशीनें भी लगाई जाएंगी।
क्या है रिंगाल
रिंगाल बांस की प्रजाति का पौधा है। यहग 2000 फीट से अधिक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। यह उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों, हिमाचल और पश्चिमी नेपाल के कुछ हिस्सों में पाया जाता है। उत्तराखंड में रिंगाल की मुख्य रूप से छह प्रजातियां पाई जाती हैं जिनका स्थानीय नाम देव रिंगाल, थाम, साररू, भाटपुत्र, मलिंगा, गोलू रिंगाल है। उत्तराखंड के रिंगाल को जीआई टैग मिला हुआ है।