मुनस्यारी (पिथौरागढ़)। 19वीं शताब्दी के महान अन्वेषक पंडित नैन सिंह रावत ने जान जोखिम में डालकर तिब्बत का नक्शा तैयार किया था। ग्राम पंचायत बसंतकोट के भटकूड़ा में 21 अक्तूबर 1830 को जन्मे पंडित रावत ने पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन किया। भारत सरकार ने पंडित के नाम पर डाक टिकट जारी कर उन्हें सम्मान दिया था। भूवैज्ञानिक कार्य के लिए रॉयल ज्योग्राफिकल सोसाइटी ने भी पंडित जी को प्रथम विक्टोरिया पदक से विभूषित किया था।
पंडित रावत के चचेरे भाई मान सिंह रावत ने भी उनके साथ अन्वेषण कार्य किया। कुशाग्र बुद्धि के होने के कारण पंडित बंधुओं ने वर्ष 1855 से 1856 में श्लाघ इट वाइट बंधुओं के साथ दुभाषिए और सर्वेक्षक के रूप में तुर्किस्तान की यात्रा की।
तिब्बती भाषा का ज्ञान और कार्यकुशलता से प्रभावित होकर जर्मन बंधु उन्हें अपने साथ यूरोप ले जाना चाहते थे लेकिन पहाड़ से प्रेम और चचेरे भाई मान सिंह के विरोध के कारण दोनों भाइयों को रावलपिंडी से लौटना पड़ा। वर्ष 1863 में इन्हें चचेरे भाई मान सिंह के साथ देहरादून बुलाया गया।
सुपरिटेंडेंट कर्नल जेटी वाकर और महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण में अन्वेषक के पद पर नियुक्त किया गया। भारतीय सीमा के बाहरी क्षेत्र में कार्य करने के लिए पंडित बंधुओं को टोपोग्राफिकल ऑब्जर्वेशन का प्रशिक्षण कार्य सौंपा गया।
फोटो विवरण- 20पीटीएच 01पी-
पंडित नैन सिंह रावत (फाइल फोटो)
इनसेट
तिब्बत की भौगोलिक स्थिति का ज्ञान बाहर वालों को नहीं था
मुनस्यारी (पिथौरागढ़)। यूरोपीय जगत को तिब्बत में प्रवेश प्रतिबंधित होने के कारण मार्च 1865 को दोनों पंडित बंधुओं को नेपाल होकर ल्हासा के सर्वेक्षण के लिए भेजा था। पंडित के चचेरे भाई मान सिंह को मध्य में ही अपनी यात्रा स्थगित कर स्वदेश लौटना पड़ा लेकिन पंडित रावत ने एक लद्दाखी की वेश में दावा नमग्यल के नाम से नौकर बनकर तिब्बत में प्रवेश किया। संवाद
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1866 से शुरू किया था कार्य
मुनस्यारी (पिथौरागढ़)। पंडित नैन सिंह ने 10 जनवरी 1866 को ल्हासा पहुंचकर दो कमरे का एक मकान किराये पर लिया। उसके बाद सर्वेक्षण कार्य शुरू किया। करीब 100 दिन तक ल्हासा में रहकर वहां की भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक स्थिति का अध्ययन करने के बाद लद्दाखी व्यापारी के साथ ल्हासा-लद्दाख मार्ग का सर्वेक्षण करते हुए त्रादाम पहुंचे। मार्ग व्यय की कमी के कारण उन्हें अपनी घड़ी तक बेचनी पड़ी थी। ऊंटाधुरा पार कर पंडित रावत 21 जून 1866 को मिलम गांव पहुंचे और वहां से देहरादून चले गए। संवाद
1200 मील की लंबी दूरी का किया सर्वेक्षण
मुनस्यारी (पिथौरागढ़)। पंडित रावत ने काठमांडो-ल्हासा-मानसरोवर तक की 1,200 मील लंबी दूरी का सर्वेक्षण किया। उन्होंने 21 स्थानों पर अक्षांश बिंदु और 33 स्थानों की समुद्र तल से ऊंचाई ज्ञात कर विश्व के लिए ऐतिहासिक कार्य किया। उन क्षेत्रों की रोचक और ज्ञानवर्धक वर्णन अपनी डायरी में अंकित किया। संपूर्ण तथ्यों का सारांश कर्नल मांटोगोमरी ने सोसाइटी के जनरल में 38वें खंड में किया है। इनकी इस महान यात्रा से प्राप्त उपलब्धियों के उपलक्ष्य में वर्ष 1868 में सोसाइटी ने उन्हें एक स्वर्ण घड़ी प्रदान की थी। संवाद
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