कनालीछीना ब्लॉक के डांगठी गांव की एक बाखली।
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पिथौरागढ़ में कभी खेतीबाड़ी और पशुपालन से आत्मनिर्भर रहा कनालीछीना विकास खंड का डांगठी गांव आज पलायन की पीड़ा का प्रमाण बन चुका है। जिन खेतों में कभी हरियाली लहलहाती थी, वो अब बंजर पड़े हैं। जिन आंगनों में बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, वहां सन्नाटा पसरा है। जंगली जानवरों की बढ़ती धमक और रोजगार के अभाव ने इस गांव को धीरे-धीरे खाली कर दिया।
डांगठी ग्राम सभा के अंतर्गत डांगठी गांव के साथ आगांव, नेबाड़ा, भागीचौरा और कुलेख तोक आते हैं। अकेले डांगठी गांव में कभी 75 परिवार आबाद थे। घरों के गोठ पशुओं से भरे रहते थे और खेत अनाज से। सामाजिक कार्यकर्ता विक्रम सिंह पोखरिया बताते हैं कि आज गांव में सिर्फ 25 परिवार रह गए हैं, जिनकी कुल आबादी महज 75 से 80 के बीच सिमट चुकी है।
विडंबना यह है कि जब तक गांव तक सड़क नहीं पहुंची थी, तब तक गांव आबाद रहा। सड़क आई तो लोग पढ़-लिख सके। परिवारों में संपन्नता बढ़ी लेकिन गांव से नाता कमजोर पड़ता चला गया। आज इस गांव के लोग डॉक्टर, सैन्य अधिकारी, बैंककर्मी, शिक्षक और इंजीनियर जैसे पदों पर हैं मगर गांव में उनकी मौजूदगी अब साल में एक-दो बार आने तक सिमट गई है।
जो लोग अब भी गांव में टिके हैं, वे खेतीबाड़ी और पशुपालन से जुड़े रहना चाहते हैं। विडंबना यह है कि बंदर, लंगूर और जंगली सुअरों की लगातार बढ़ती धमक ने उनका हौसला तोड़ दिया है। ग्रामीण गोविंद सिंह बताते हैं कि दूरदराज के खेतों में फसल बोना जोखिम भरा हो गया है। नतीजतन कई खेत बंजर हो चुके हैं। रोजगार की कमी ने युवाओं को मैदानी इलाकों की ओर धकेल दिया है।
जिंदा हैं उम्मीदें...
जंगली जानवरों पर प्रभावी नियंत्रण हो तो हालात बदल सकते हैं। गांव में रोजगार के साधन विकसित किए जाएं तो आज भी पलायन की रफ्तार को थामा जा सकता है। -लक्ष्मण सिंह, ग्रामीण
थोड़ी सी सरकारी पहल डांगठी जैसे गांवों में फिर से जिंदगी लौटा सकती है। बाहर जा बसे लोगों को अपने जन्मभूमि के बारे में सोचना होगा, वरना खेतों के साथ-साथ आंगन भी सदा के लिए सूने हो जाएंगे। -प्रदीप सिंह, ग्रामीण