पहाड़ की पहाड़ सरीखी समस्याओं में शामिल है स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद उम्मीद जगी थी कि पहाड़ में स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर होंगी लेकिन हुआ कुछ नहीं। संसाधन और डॉक्टर न होने से मरीजों को रेफर किया जा रहा है। पहाड़ में बीमार होने का मतलब है कि कई तरह की परेशानियों का एक साथ आना। इससे जूझते लोग सिस्टम को कोसते हैं लेकिन उनके हाथ आती है मायूसी। चंपावत और पिथौरागढ़ जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की पड़ताल की गई तो स्वास्थ्य सेवाओं की पीड़ादायक बीमारी का पता चला।
पिथौरागढ़ : मशीन जंग खा रही, मरीज धक्के
पिथौरागढ़। पांच लाख की आबादी वाले पिथौरागढ़ जिले में स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं। 224 छोटे-बड़े अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक न होने के कारण अधिकतर मरीजों को हायर सेंटर रेफर करना पड़ रहा है।
राज्य गठन से पहले पिथौरागढ़ जिले में चिकित्सा सुविधाएं सीमित थीं। राज्य गठन के बाद गंगोलीहाट, बेड़ीनाग, मुनस्यारी, धारचूला अस्पताल को उच्चीकृत कर सीएचसी बनाया गया। इनमें विशेषज्ञ चिकित्सकों के पद तो सृजित हैं लेकिन कभी विशेषज्ञ डॉक्टर की तैनाती नहीं की गई। सीएचसी में अल्ट्रासाउंड मशीन रखी गई है लेकिन रेडियोलॉजिस्ट न होने से इनका उपयोग नहीं हो पा रहा है।
राज्य गठन के बाद अल्ट्रासाउंड, ईसीजी, डिजिटल एक्सरे की सुविधा मिली। पथरी, एपेंडिक्स, ट्यूमर सहित जिस शल्य चिकित्सा के लिए बड़े शहरों की ओर जाना पड़ता है। बेस अस्पताल में डायलिसिस और सीटी स्कैन की सुविधा मरीजों को मिल रही है।
ट्रामा सेंटर की उलझन
जिले में भले ही कई बीमारियों का उपचार मिल रहा हो लेकिन हृदय रोग विशेषज्ञ नहीं है। किसी को हृदयाघात होने पर यहां से 230 किमी दूर हल्द्वानी ले जाना पड़ता है। ऐसे में कई मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। जिले में स्वीकृत ट्रामा सेंटर भूमि चयन में ही उलझकर रह गया है। ट्रामा सेंटर न होने से दुर्घटना में गंभीर रूप से घायलों को उपचार नहीं मिल पाता।
बरामदे में उपचार
जिले में एक जिला अस्पताल, महिला अस्पताल, उप जिला चिकित्सालय धारचूला, चार सीएचसी, सात पीएचसी टाइप बी, 46 पीएचसी टाइप ए, 163 परिवार कल्याण और अन्य दो चिकित्सा इकाई हैं। जिला चिकित्सालय को छोड़कर कहीं भी पर्याप्त मात्रा में स्टाफ नहीं है। सीएचसी में महिला विशेषज्ञ नहीं हैं। प्रसव के लिए आने वाली महिलाओं को जिला अस्पताल रेफर कर दिया जाता है। राज्य गठन के बाद 60 बेड का जिला अस्पताल 120 बेड का हो गया। यहां भी बरामदे में उपचार करना पड़ रहा है।
अपनी-अपनी पीड़ा
राज्य गठन के बाद अस्पताल उच्चीकृत तो कर दिए लेकिन संसाधन और विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं दिए। जिले से उपचार के लिए हल्द्वानी, बरेली जाने के लिए मजबूर हैं। बाजार से महंगी दवा लेनी पड़ती है। - तारा सिंह, पिथौरागढ़।
सीएचसी में पद सृजित किए गए हैं। विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती नहीं की गई। संसाधन उपलब्ध कराने के साथ ही महिला रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ और हड्डी रोग विशेषज्ञों की तैनाती हर सीएचसी में होनी चाहिए। - धन सिंह कफलिया, डीडीहाट।